पंचकर्म से लकवा, गठिया, स्लिप डिस्क जैसी बीमारियों का इलाज करवाने देशभर से मरीज जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (NIA) पहुंचते हैं। लेकिन इलाज के लिए उन्हें 3 से 4 महीने का इंतजार करना पड़ता है। सबसे बड़ा कारण वेटिंग। बाहर 2 से 2.5 लाख में होने वाला इलाज यहां मुफ्त में होता है। लेकिन दूर-दराज से आने वाले कई मरीज गैलरी में बेड लगाकर इलाज करवाने को मजबूर हैं। इसकी वजह है, संस्थान में बेड की सीमित संख्या। यहां पंचकर्म के लिए महज 48 जनरल बेड हैं, जबकि डेली 200 से अधिक मरीज आ रहे हैं, जिन्हें पंचकर्म की जरूरत है। केंद्रीय आयुष मंत्री प्रतापराव जाधव की मांग पर राज्य सरकार ने जमीन देने आश्वासन भी दिया था। लेकिन अभी कोई समाधान नहीं आया है। पढ़िए मंडे स्पेशल स्टोरी… केस-1 : गैलरी में बेड लगाकर किया उपचार पंजाब से आई 35 वर्षीय जसवीर कौर पेट दर्द और इन्फेक्शन की समस्या से परेशान थीं। आयुर्वेद डॉक्टरों ने उन्हें पंचकर्म की सलाह दी, जिसके बाद वह उम्मीद लेकर जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान पहुंचीं। लेकिन यहां पहुंचते ही उन्हें पता चला कि कोई बेड खाली नहीं है। जसवीर बताती हैं कि इतनी दूर से आने के बाद बिना इलाज नहीं लौटना चाहती थी। उन्होंने डॉक्टरों से गुजारिश की-‘जैसी भी जगह हो, जहां भी जगह मिले मुझे भर्ती कर लो।’ संस्थान की ओर से उन्हें बताया गया कि गैलरी में एक बेड उपलब्ध है, अगर उन्हें कोई दिक्कत न हो तो वहां रह सकती हैं। मजबूरी में जसवीर कौर ने वही विकल्प चुना। आज 15 दिनों से वह गैलरी में ही भर्ती होकर इलाज करा रही हैं। उनका कहना है ‘इतनी दूर से आई हूं, अब बिना ट्रीटमेंट वापस नहीं जा सकती। जहां इलाज मिल रहा है, वही मेरे लिए सही है। केस-2 : 25 दिन में मिला राहत का अनुभव इंदौर से आए 51 साल के अखिलेश चौधरी सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस से जूझ रहे थे। लंबे समय तक उन्होंने एलोपैथिक दवाइयां लीं, लेकिन कोई खास फायदा नहीं हुआ। उल्टा, कुछ अन्य समस्याएं भी बढ़ने लगीं। इसके बाद किसी परिचित ने उन्हें जयपुर के इस संस्थान के बारे में बताया। अखिलेश यहां आए और पंचकर्म के जरिए इलाज शुरू कराया। बीते 25 दिनों से वह संस्थान में भर्ती हैं और अब उन्हें पहले से काफी राहत महसूस हो रही है। अखिलेश कहते हैं- सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए जिससे मरीजों को समय पर इलाज मिल सके। अंग्रेजी दवाइयों से तुरंत राहत मिलती है, लेकिन यहां बिना नुकसान के स्थायी इलाज मिलता है। मरीज हजारों, लेकिन बैड सिर्फ 48 और 5 कॉटेज संस्थान में हड्डियों से जुड़ी बीमारियां, जोड़ों का दर्द, सर्वाइकल, स्लिप डिस्क, लकवा, न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर जैसे कई रोगों का पंचकर्म से इलाज किया जा रहा है। मरीजों का कहना है कि जहां एलोपैथी में उन्हें लंबे समय तक राहत नहीं मिली, वहीं पंचकर्म से उन्हें सुधार देखने को मिला है। यही कारण है कि रोजाना यहां मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। डॉक्टरों के अनुसार, पंचकर्म के जरिए शरीर को अंदर से डिटॉक्स कर बीमारियों की जड़ पर काम किया जाता है, जिससे स्थायी राहत मिलती है। संस्थान में पंचकर्म के मरीजों के लिए सिर्फ 48 बेड और 5 कॉटेज उपलब्ध हैं। एक दिन में लगभग 200 पेशेंट आ रहे हैं, जिन्हें पंचकर्म और अलग-अलग थेरेपी की जरूरत है। ओपीडी और आईपीडी को मिलाकर 500 से ज्यादा पंचकर्म की थेरेपी की जा रही हैं। वेटिंग का और क्या कारण? एनआईए के रिकॉर्ड के अनुसार 2025 में लगभग 1 लाख 33 हजार प्रोसीजर्स और 68 हजार मरीज थे। लेकिन इस बार जनवरी से अब तक का आंकड़ा पिछले साल की तुलना में बहुत बढ़ा है। लास्ट 3 महीने में कुल प्रक्रियाएं 26,403 और कुल मरीजों की संख्या 13,952 रही। कुछ मरीज ऐसे होते हैं जिन्हें एक-दो थेरेपी की ही जरूरत होती है। लेकिन कुछ को भर्ती करना पड़ता है। ऐसे मरीजों को इलाज के दौरान 15 दिन से लेकर एक महीने तक संस्थान में रहना पड़ता है। यही वजह है कि नए मरीजों के लिए जगह खाली होने में लंबा समय लग जाता है और वेटिंग लिस्ट लगातार बढ़ती जा रही है। 3 महीने की वेटिंग-मरीजों की बढ़ती परेशानी चाहे सामान्य वार्ड हो या कॉटेज, हर जगह मरीजों को 3 महीने से ज्यादा का इंतजार करना पड़ रहा है। कई मरीज तो अपनी बारी आने तक दर्द और बीमारी के साथ जूझते रहते हैं। कुछ मरीजों ने ऑफ कैमरा बताया कि उन्हें डॉक्टर ने जल्द पंचकर्म की सलाह दी थी, लेकिन वेटिंग इतनी लंबी है कि इलाज शुरू होने में ही महीनों लग रहे हैं। पंचकर्म विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. गोपेश मंगल ने बताया कि ‘हमारे यहां दूर-दूर से मरीज आ रहे हैं। ज्यादातर वे लोग होते हैं जो अन्य जगहों पर इलाज करवाकर थक चुके होते हैं। यहां आने के बाद उन्हें काफी राहत मिल रही है। खासतौर पर न्यूरो, ऑर्थो और स्किन से जुड़े मरीजों की संख्या ज्यादा है। पंचकर्म के दौरान मरीज की डाइट, दिनचर्या और कई थेरेपी के सेशन कराए जाते हैं, जिससे शरीर पूरी तरह डिटॉक्स होता है। प्राइवेट संस्थानों में पंचकर्म का खर्च प्राइवेट संस्थानों में पंचकर्म थेरेपी कराने का खर्च लगभग 30,000 से शुरू होकर 2–2.5 लाख तक जा सकता है। छोटे क्लिनिक में प्रति दिन 1,000 से 5,000 तक लग सकते हैं। जबकि 7–14 दिन के पैकेज 30,000 से 1 लाख या उससे अधिक के होते हैं। वहीं 21 दिन का पूरा डिटॉक्स या रीजुवेनेशन कोर्स प्राइवेट वेलनेस सेंटर में 1 लाख से 2.5 लाख तक पहुंच सकता है, खासकर जब उसमें रहना, खाना, योग और डॉक्टर की निगरानी शामिल हो। कमेटी बनी, लेकिन अंतिम मुहर बाकी संस्थान प्रशासन ने इस दिशा में कदम उठाते हुए चार सदस्यों की एक कमेटी बनाई है, जिसका काम नई जगह तलाशना है। कमेटी ने अपनी तरफ से कुछ संभावित स्थानों की पहचान भी की है और प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजे जा चुके हैं। लेकिन अब तक सरकार की ओर से किसी भी प्रस्ताव पर अंतिम मुहर नहीं लग पाई है। दरअसल, संस्थान चाहता है कि जमीन शहर के नजदीक ही मिले क्योंकि इससे मरीजों को वहां आने में दिक्कत नहीं आएगी। क्योंकि अगर शहर से ज्यादा दूरी पर जमीन तलाशी गई तो मरीज वहां तक पहुंच ही नहीं पाएंगे। इसी के साथ सिर्फ पंचकर्म के लिए सरकार से किराए की भी जगह मांगी गई है। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के कुलपति डॉ. संजीव शर्मा ने कहा- हमें उम्मीद है कि जल्द ही सरकार की ओर से जमीन उपलब्ध करा दी जाएगी। इसके साथ ही पंचकर्म के लिए किराए पर भवन लेने की प्रक्रिया भी चल रही है, जो जल्दी पूरी होने की संभावना है। मरीजों की बढ़ती संख्या यह दिखाती है कि यहां इलाज से लोगों को फायदा मिल रहा है। हमारी कोशिश है कि जल्द से जल्द सुविधाएं बढ़ाकर सभी मरीजों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराया जाए।’ …. राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… खून चूसने वाली जोंक से गंजेपन का इलाज?:स्किन इंफेक्शन और मुंहासों के लिए भी जोंक थेरेपी, दावा- 1100 से ज्यादा मरीजों का सफल ट्रीटमेंट जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में पारंपरिक जोंक पद्धति (Leech Therapy) आधुनिक स्किन और हेयर ट्रीटमेंट का विकल्प बनकर तेजी से उभर रही है। पूरी खबर पढ़िए…