चाक पर आकार लेते मिट्टी के घड़े, चारों तरफ बैठे ग्रामीणों की एकटक निगाहें। ये सभी ग्रामीण इस बार के मानसून की स्थिति देखने के लिए पहुंचे है। मारवाड़ की धरती का यह अनोखा रंग हाली अमावस्या पर शुक्रवार को फिर देखने को मिला। जैसे ही एक घड़े से पानी निकला, लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। जोधपुर जिले के तिंवरी क्षेत्र में करीब 200 साल पुरानी लोक परंपरा से अकाल-सुकाल (मानसून) का अनुमान लगाया गया। ज्येष्ठ में मानसून कमजोर रहने का अनुमान
मान्यता के अनुसार इस बार ज्येष्ठ (मई-जून) में मानसून की शुरुआत कमजोर रहेगी, लेकिन आषाढ़, भाद्रपद और श्रावण में मानसून अच्छा रहने वाला है। इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं माना जाता, फिर भी स्थानीय अनुभव और वर्षों की परंपरा के कारण ग्रामीणों का इस पर गहरा विश्वास है। बुजुर्गों के अनुसार कई बार इस विधि से मिले संकेत वास्तविक मौसम के काफी करीब साबित हुए हैं। पढ़ें क्या है रोचक परंपरा… किसान प्रेमसुख परिहार ने बताया- हाली अमावस्या के दिन गांव के लोग कुम्हार के घर पर पहुंचते हैं। कुम्हार के चाक के चारों तरफ ग्रामीण बैठते हैं। कुम्हार चाक की रफ्तार बढ़ाता है और मिट्टी से पांच छोटे घड़े (कुल्हड़) तैयार करता है। परिहार ने बताया- पांच घड़ों का विशेष महत्व होता है। चाक के पास जमीन पर एक आयताकार आसन बनाया जाता है। चार कोनों में चार घड़े रखे जाते हैं और एक घड़ा बीच में रखा जाता है। चार महीनों और आकाश के प्रतीक
चार कोनों में रखे गए घड़े चार महीनों- ज्येष्ठ (मई-जून), आषाढ़ (जून-जुलाई), श्रावण (जुलाई-अगस्त) और भाद्रपद (अगस्त-सितंबर) का संकेत होते हैं। बीच में रखा गया घड़ा आकाश का प्रतीक होता है। इंद्र भगवान की पूजा-अर्चना कर आसन के पास अगरबत्ती लगाई जाती है। इसके बाद सभी घड़ों में धान डालकर पानी भरा जाता है। घड़ों से निकलने वाले पानी के आधार पर मौसम का अनुमान लगाया जाता है। करीब 200 साल पुरानी परंपरा
किसान देवराम परिहार ने बताया- घड़े में पानी भरकर मौसम का अनुमान लगाने की परंपरा 200 साल पुरानी है। इस परंपरा की शुरुआत में सबसे पहले पानी में गुड़, चाय, मिश्री और दूध डालकर पंचामृत बनाया जाता है। पंचामृत सबसे पहले अन्न देने वाली धरती को अर्पित किया जाता है। फिर कुम्हार के चाक, शंकर, गणेश और आकाश को अर्पित किया जाता है। इसके बाद कुम्हार चाक पर घड़े तैयार करता है। चाक घुमाने वाले कुम्हार को हल चलाने वाला किसान माना जाता है, जिसे घड़ों में भरा जाने वाला पानी पांच बार पिलाया जाता है। एक मिनट तीन दिन के बराबर
किसान देवराम परिहार ने बताया कि मानसून का अनुमान लगाने के लिए घड़ों पर नजर रखी जाती है और समय का ध्यान रखा जाता है। एक मिनट को तीन दिन के बराबर माना जाता है। यदि ज्येष्ठ का घड़ा तीन मिनट में फूटता है तो माना जाता है कि ज्येष्ठ लगते ही 9-10 दिन बाद मानसून की बारिश होगी। इसी तरह सभी महीनों के घड़ों से अनुमान लगाया जाता है। 9 मिनट में फूटा ज्येष्ठ का घड़ा
इस बार ज्येष्ठ का घड़ा 9 मिनट बाद फूटा, ऐसे में 27 दिन के अनुमान के अनुसार ज्येष्ठ में बारिश की संभावना नहीं है। वहीं, आषाढ़ का घड़ा साढ़े चार मिनट में फूटा। इसके अनुसार 27 जून से 5 जुलाई तक बारिश होने का अनुमान है। इंद्र भगवान को लगाते हैं विशेष भोग
बारिश के लिए इंद्र भगवान को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। हाली अमावस्या से एक दिन पहले शाम को बाजरा भिगोया जाता है। सुबह बाजरे को हाथों से कूटकर खींच (खिचड़ी) तैयार की जाती है। इसके साथ गलवानी भी बनाई जाती है, जिसके लिए गुड़ को पिघलाकर उसमें आटा मिलाया जाता है। इस प्रकार तैयार भोग भगवान को अर्पित करने के बाद मौके पर मौजूद लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं।
