अलवर में काली मोरी फाटक पर रविवार सुबह साढ़े 10 बजे अंडरपास का काम शुरू हुआ। यहां 200 से अधिक मजदूर, रेलवे व पीडब्ल्यूडी के कर्मचारी अधिकारी मशीनों के साथ काम में जुटे हैं। इस दौरान दैनिक भास्कर रिपोर्टर ने देखा कि अंडरपास बनता कैसे है। रेलवे ने अंडरपास बनाने के लिए करीब सवा 7 घंटे का वक्त अधिकारियों को दिया गया। इसमें पटरियों को हटाना, 5 मीटर खुदाई करने से लेकर और बड़े-बड़े सीमेंट के ब्लॉक को फिक्स करने का काम किया गया। इस दौरान रूट पर कोई ट्रेन नहीं चलीं। अंडरपास बनाने के लिए सबसे पहले रेलवे की पटरी हटाकर करीब 16 मीटर के हिस्से में 5 मीटर गहरा गड्ढा खोदा गया। इस गड्ढे में अंडरपास बनाने के लिए सीमेंट के ब्लॉक जमाए जाते हैं। मशीनों की मदद से करीब 25 से 30 ब्लॉक लगाए जाते हैं। जिन्हें कंक्रीट की मदद से फिक्स किया जाता है। मजबूती देने के लिए सीमेंट के ब्लॉक के दोनों तरफ लोहे के गार्डर लगाते हैं। ताकि अगल-बगल से मिट्टी खिसके नहीं। सीमेंट के ब्लॉक लगाने के बाद उसके ऊपर वापस समतल ब्लॉक लगाए जाते हैं। फिर रोडी बिछाई जाती है। इसके ऊपर रेलवे की काटी पटियों को दुबारा सैट किया जाता है। पूरा काम होने के बाद रेलवे की टीम मौका मुआयना करती है। एक बार ट्रायल किया जाता है। इसके बाद रेलवे की एक्सपर्ट टीम की हरी झंडी मिलने के बाद ट्रेनों को सुचारू किया जाता है। सवा 7 घंटे का समय मिला रेलवे के ठेकेदार यश जैन ने बताया- हमें सवा 7 घंटे का ब्लॉक मिला है। उसमें यह पूरा काम करना है। करीब 200 से अधिक लोगों की टीम इस काम में जुटी। 2 महीने बाद लोग अंडरपास से जा सकेंगे पीडब्ल्यूडी अधीक्षण अभियंता अल्का व्यास ने बताया- रेलवे लाइन के नीचे के हिस्से का निर्माण करना ही सबसे बड़ा काम होता है। इस बीच में ट्रेनों की आवाजाही बंद रहती है। पटरी के काटे हिस्से को वापस दुरुस्त करना होता है। इस काम के बाद अगल-बगल का काम दो महीने में पूरा हो जाएगा। उसके बाद आम लोग अंडरपास से आ जा सकेंगे।
