जयपुर के सवाई मानसिंह हॉस्पिटल (SMS) के सर्जरी विभाग ने एक 11 साल के बच्चे के झिल्ली (डायफ्राम) में हुए छेद की सर्जरी की। इस बच्चे के जन्म से ही ये छेद था। इसके कारण थोड़ा चलने, खेलने-कूदने या सीढ़ियां चढ़ने में सांस फूलने लगती थी। एसएमएस हॉस्पिटल के प्रिंसिपल डॉ. दीपक माहेश्वरी ने बताया- अलवर का रहने वाले इस बच्चे के पिछले कुछ माह में तकलीफ बहुत ज्यादा बढ़ गई थी। इसके बाद जब वह एसएमएस हॉस्पिटल की ओपीडी में आया तो वहां सर्जरी विभाग की टीम ने सीटी स्कैन समेत दूसरी जांच करवाई। इसमें बीमारी का पता चला। लीवर का 70 फीसदी हिस्सा खिसका सर्जरी डिपार्टमेंट के सीनियर प्रोफेसर डॉ. जीवन कांकरिया ने बताया- जांच में पता चला कि बच्चे को जन्म से ही डायफ्रामेटिक हर्निया की समस्या थी। इस स्थिति में पेट और सीने को अलग करने वाली झिल्ली में छेद होने के कारण लीवर का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा, गॉल ब्लैडर और आंतों का बड़ा भाग खिसककर सीने के दाहिने हिस्से में चला गया था। इसके कारण दाहिना फेफड़ा लगभग सिकुड़ गया। जब भी बच्चा खेलता-कूदता या थोड़ा ज्यादा पैदल चलता तो उसे पर्याप्त सांस नहीं मिल पा रही थी। एक ही फेफड़े के सहारे जीवन बिता रहा था। डॉ. कांकरिया ने बताया डायफ्रामेटिक हर्निया एक दुर्लभ (रेयर) जन्मजात बीमारी है। सामान्यतः यह समस्या शरीर के बाईं तरफ अधिक पाई जाती है, जबकि दाईं तरफ (राइट साइड) होने वाले मामलों की प्रतिशत बहुत कम होती है। दूरबीन से ऑपरेशन करके ठीक किया डायफ्राम इस जांच के बाद टीम ने सर्जरी का निर्णय किया। बच्चे की सर्जरी दूरबीन से की गई। सर्जरी के दौरान सबसे बड़ी चुनौती लीवर का 70 प्रतिशत हिस्सा, गॉल ब्लैडर और आंतों का बड़ा भाग जो सीने में चला गया था। उन सभी को सीने से निकालकर वापस पेट में लाकर स्थापित करना रहा। इस पूरी सर्जरी में केवल तीन छोटे-छोटे छेद (एक 10MM और दो 5-5MM के) ही करने पड़े। इन्हीं छोटे छेदों के माध्यम से लगभग दो घंटे तक चली सर्जरी में सभी अंगों को सावधानीपूर्वक वापस पेट में स्थापित किया। ऑपरेशन के दौरान ही फेफड़े को फुलाकर जांच की गई और यह सुनिश्चित किया गया कि वह सही प्रकार से काम कर रहा है या नहीं। इसके बाद डायफ्राम में मौजूद छेद को विशेष जाली (मेश) लगाकर मजबूती से बंद किया। इस सर्जरी में डॉ. कांकरिया के साथ सर्जरी टीम से डॉ. बुगालिया, डॉ. गरिमा, डॉ. अनिल, डॉ. मेकला और एनेस्थीसिया विभाग से डॉ. सुशील भाटी, डॉ. सुनील चौहान, डॉ. इंदु, डॉ. मनोज सोनी का विशेष सहयोग रहा।
