‘1857 की क्रांति के भारतीय सिपाही (नायक) हत्यारे, खून के प्यासे, बदमाश और अंग्रेज वीर थे।’ कोटा शहर के बीचों-बीच नयापुरा में अंग्रेजों के कब्रिस्तान (ब्रिटिश सेमेट्री) में एक कब्र पर यह लिखा हुआ है। दुखद यह है कि क्रांति के 169 साल बाद भी इस कब्र को एक कमेटी की ओर से ऐतिहासिक स्मारक बताकर सहेजकर रखा जा रहा है। दूसरी ओर, भारतीय नायकों के फोटो तक नहीं हैं। उन्हें आज तक सम्मान नहीं मिला। कोटा में 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले भारतीय वीरों के बारे में इस कब्र पर बदला चुकाने जैसी शब्दावली भी लिखी है। इतिहासकारों के अनुसार यह भाषा आपत्तिजनक है। देश का इतिहास हमें पढ़ाता है कि 1857 की क्रांति देश की आजादी की नींव थी। 1857 की क्रांति को प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कहा गया। यह इतिहास की एक युगांतरकारी घटना थी। इसने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिला दिया और भविष्य की आजादी के संघर्ष के लिए एक मजबूत नींव रखी। अंग्रेजों ने इसे इंडियन म्युनिटी (भारतीय विद्रोह) नाम दिया था। इसी आंदोलन के दौरान कोटा में अंग्रेजी हुकूमत के एजेंट मेजर बर्टन और उनके दो बेटों को क्रांतिकारियों ने मार दिया था। नयापुरा स्थित अंग्रेजों के कब्रिस्तान में इन तीनों की कब्र है। यहां बर्टन की पत्नी की ओर से पत्थर की स्मारक पट्टिका लगवाई हुई है। जिस पर भारतीय सिपाही (नायक) के बारे में आपत्तिजनक शब्द लिखे हैं। गौरतलब है कि इसी 23 फरवरी को राष्ट्रपति भवन में अशोक मंडप के पास लगी नई दिल्ली के शिल्पकार एडमिन लुटियंस की प्रतिमा हटाई गई। उनकी जगह स्वतंत्र भारत के पहले और एकमात्र गवर्नर जनरल रहे सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा लगाई गई। स्मारक पट्टिका पर यह लिखा है “40वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री रेजिमेंट के ब्रेवेट मेजर चार्ल्स एनेअस बर्टन (47 वर्ष) जो हाड़ौती में राजनीतिक एजेंट थे। बर्टन और उनके दो बेटे ऑथर रॉबर्ट (21 साल, 1 महीना) और फ्रांसिस क्लर्क (19 साल, 8 महीने) की स्मृति में यह स्मारक स्थापित किया गया है। तीन अंग्रेज, जिन्हें 15 अक्टूबर 1857 को भारतीय विद्रोह के वर्ष में कोटा के महाराज के रक्तपिपासु (खून के प्यासे) सैनिकों ने उनके निवास स्थान पर बेरहमी से घेर लिया था। 5 घंटे तक इन वीर पुरुषों एक पिता और दो पुत्रों ने सभी बदमाशों को रोक रखा था, लेकिन अंत में अकेले और निहत्थे होने के कारण उन पर काबू पा लिया गया और उनकी निर्मम हत्या कर दी गई। यह स्मारक एक दुखद पत्नी और मां द्वारा स्थापित किया गया है। ‘प्रभु कहते हैं बदला मेरा है, मैं चुकाऊंगा ‘।” बर्टन का सिर काटकर पूरे शहर में घुमाया इतिहासकार नाथूराम खगड़ावत की पुस्तक ‘राजस्थान्स रोल इन स्ट्रगल ऑफ 1857’ में कोटा में 1857 में हुई उथल-पुथल पर एक चैप्टर है। इसमें लिखा है- ‘15 अक्टूबर 1857 को लाला जयदयाल और मेहराब खान के नेतृत्व में शहर की भीड़ ने रेजिडेंस को घेर लिया था। मेजर और उनके दो बेटों की हत्या कर दी। जनता का आक्रोश इस कदर था कि बर्टन का सिर काटकर पूरे शहर में घुमाया गया। सरकारी खजाने, भंडारगृहों और तोपखानों पर कब्जा कर लिया। जिससे राज्य को उस दौर में 18 लाख 46 हजार 454 का नुकसान हुआ। कोटा करीब 6 महीने तक नियंत्रण में रहा।’ ‘30 मार्च 1858 को भीषण गोलीबारी और संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने कोटा शहर पर फिर से कब्जा कर लिया। यह केवल सैनिकों का विद्रोह नहीं था। बल्कि इसमें आम जनता की गहरी ब्रिटिश विरोधी भावनाएं भी शामिल थी। कोटा पर दोबारा कब्जा करने के बाद ब्रिटिश सैनिकों ने शहर में जमकर लूटपाट की और लोगों पर अत्याचार किए, कई घरों को जला दिया गया, कई लोगों को फांसी दी गई।’ इतिहासकारों का मानना है कि कोटा का विद्रोह अन्य स्थानों से अलग था। क्योंकि यहां सेना के साथ-साथ आम नागरिकों ने भी सक्रिय भाग लिया था। यह राजस्थान का एकमात्र ऐसा स्थान था, जहां क्रांतिकारियों ने इतने लंबे समय तक एक संगठित प्रशासन चलाया। (यह पुस्तक अगस्त 1957 में राजस्थान सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से प्रकाशित की गई थी।) आज भी ऐसा स्मारक घोर आपत्तिजनक अंग्रेजों से अपने साथियों की रिहाई के लिए कोतवाली पर कब्जा करने वाले स्वतंत्रता सेनानी स्व. पंडित गुलाबचंद शर्मा के बेटे विश्व प्रकाश शर्मा ‘विष्णु भैया’ ने कहा- देश जब गुलाम था, तब अंग्रेज कुछ भी लिख सकते थे। उनका शासन था। अब देश आजाद हुए अरसा बीत गया और आज भी ऐसा स्मारक है। यह घोर आपत्तिजनक है। कोटा की घटना ने अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया था इतिहासकार फिरोज अहमद कहते हैं- यह भाषा आपत्तिजनक तो है, लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि यह विरासत है। मुझे यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि 1857 की क्रांति में कोटा में हुई इस घटना ने अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया था। इस आंदोलन की अगुवाई करने वाले मेहराब खान और लाला जयदयाल के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। इतिहासकार डॉ. अरविंद सक्सेना ने कहा- जिन क्रांतिकारियों ने स्वाधीनता आंदोलन में जीवन बलिदान कर दिया। उनके लिए अपशब्दों का प्रयोग ठीक नहीं है। अंग्रेजी हुकूमत या पराधीनता का स्मरण करने वाले कई प्रतीकों को हटा रहे हैं, तो यह उचित समय है। इस शिलालेख को तत्काल प्रशासनिक प्रक्रिया और प्रयासों से हटाया जाए। सोसाइटी का तर्क कब्रिस्तान की देखरेख करने वाली कोटा हेरिटेज सोसाइटी की ट्रेजरर विक्टोरिया सिंह ने कहा- कब्रिस्तान जिस रूप में है। उसी रूप में हम सार संभाल कर रहे हैं। सोसाइटी के पास यह एक ही नहीं, कई प्रोजेक्ट हैं। सोसाइटी के डायरेक्टर मेंबर गंगा सिंह का कहना है कि सोसाइटी दूसरे अच्छे काम भी कर रही है। इसलिए हम इसको सपोर्ट करते हैं।