नमस्कार काले शीशे वाली कार का विवाद थम नहीं रहा। पीसीसी चीफ और भाजपा विधायक ने एक-दूसरे पर वार-पलटवार कर दिया। कोटा में अधिकारियों का सरकारी कार इस्तेमाल करना मुहाल हो गया है और जवाबदेही कानून की मांग करते हुए एक्टिविस्टों ने सरकारी छुटि्टयों का गणित समझाना शुरू कर दिया है। राजस्थान की राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. डोटासरा vs बालमुकुंदाचार्य काले शीशे वाली कार का मामला थम नहीं रहा है। जिस अंदाज में विधानसभा परिसर में विधायक बाबाजी और चीफ साहब की मुलाकात हुई, उसे सभी ने सराहा। ऐसा जान पड़ा कि सदन में एक दूसरे को पानी पी-पीकर कोसने वाले सदन के बाहर कितनी आत्मीयता से मिलते हैं। दोनों नेताओं ने एक दूसरे से राम-रमी की। चीफ साहब ने बाबा के काले शीशों वाली कार पर मजाक-मजाक में तंज भी कस दिया। कहा- ये गैरकानूनी है। बात तो सही थी, लेकिन थी मजाक की टिप्पणी। इसके बाद चीफ साहब ने ‘कार’ को पकड़ ही लिया। दूसरी जगह, दूसरे मौके पर बोले- बाबा ठेलेवालों के लाइसेंस चेक कर रहे थे, मैंने उन्हीं का लाइसेंस चेक कर दिया। चीफ साहब ने और तीखी टिप्पणी की। बोले- बाबा को किस बात का खतरा? उनके पास क्या है? इतना बड़ा एस्कॉर्ट लेकर चलते हैं। काले शीशे वाली कार में चलते हैं और ठेलेवालों को परेशान करते हैं। कैसे-कैसे नमूने आ गए। इस पर विधायक बाबा कहां चुप बैठने वाले थे। उन्होंने सीधे ‘गमछे’ पर हमला किया। पलटवार करते हुए बोले-इन्होंने जहां-जहां गमछा हिलाया है, सूपड़ा साफ हो गया। 2. सरकारी गाड़ी का निजी इस्तेमाल कोटा में दो सप्ताह पहले एक संगठन ने ऐलान किया- अगर कोई अधिकारी सरकारी कार का निजी इस्तेमाल करता पाया गया तो हम उसे रोकेंगे। चाहे कार में परिवार ही क्यों न हो, उसे उतारेंगे और गाड़ी डिपार्टमेंट भिजवाएंगे। संगठन ने खुद को टीम नायक नाम दिया। इसके बाद नगर निगम की सहायक विधि अधिकारी मैडम डीमार्ट से निकलकर सरकारी कार की तरफ जा रही थी। वीडियो बनाते हुए युवक अचानक प्रगट हुआ और सवाल दाग दिया- शनिवार को कौन सी ड्यूटी है सरकारी गाड़ी की? मैडम ने परिचय पूछा तो कहा- फलां संगठन से हूं। मैडम ने उसे अनदेखा किया और कार में जा बैठी। युवक ड्राइवर की तरफ बढ़ा और उसकी क्लास ली। कहा-अगर मैडम पर्सनल सामान लेकर सरकारी कार में गई तो मैं ठेकेदार को कहकर ब्लैकलिस्ट करा दूंगा। तंग आकर मैडम कार से उतरीं और पैदल-पैदल घर की तरफ चल दीं। 3. जवाबदेही यात्रा में समझाया छुटि्टयों का गणित राजस्थान में एक्टिविस्ट एक्टिव हैं। वे ढोल-मंजीरे लेकर गांव-गांव घूम रहे हैं। उनकी मांग है कि सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। इस यात्रा को जवाबदेही यात्रा कहा जा रहा है। इस बात को समझाने के लिए उन्होंने सरकारी छुटि्टयों का ‘गणित’ निकाला है। वे बाकायदा एक पोस्टर लेकर चल रहे हैं, जिसमें सरकारी छुटि्टयों का कैलेंडर बनाया हुआ है। माइक लेकर प्रचार किया जा रहा है कि सरकारी कर्मचारी सालभर में 192 दिन छुट्टी पर रहते हैं। यानी साल में लगभग 6 महीने उनकी छुट्टी रहती है। छह महीने ही काम करते हैं और सैलरी पूरे साल की उठाते हैं। लोगों को बात ज्ञानवर्धक से ज्यादा मनोरंजक लग रही है। इसलिए खास तौर पर छुट्टी वाला वीडियो सोशल मीडिया पर खूब घूम रहा है। वीडियो पोस्ट करने वालों को भी लोग खूब लपेट रहे हैं। कुछ लोग सरकारी कर्मचारियों के समर्थन में उतर आए हैं। पूछ रहे हैं-ये कैलेंडर कहां से निकलवा कर लाए हो, यह फर्जी है। इतनी छुटि्टयां नहीं मिलती। एक भाई को बीएलओ याद आ गए। उसने कमेंट किया- सरकारी कर्मचारियों की हालत उन्हीं से पूछो। इतवार की छुट्टी भी नहीं मिल रही। पचास तरह के काम कर रहे हैं। सौ तरह की मुसीबतें झेल रहे हैं। अपने-अपने तर्क हैं। जवाबदेही का ढोल बजाते हुए यात्रा एक गांव से दूसरे गांव की ओर बढ़ गई। (इनपुट सहयोग- नितिन शर्मा (कोटा)) वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल मुलाकात होगी…
