मैं 20 साल से चाइल्ड व पैरेंट काउंसलिंग कर रही हूं। बच्चों के मामले बड़ों से बिल्कुल अलग होते हैं। कोई डर, सदमे और दुख से जूझ रहा होता है तो कोई काल्पनिक दुनिया में खोया होता है। एक बच्चा डर में कैसा महसूस करता है, असुरक्षा उसे कैसे तोड़ती है ये देखना काफी बेचैन करता है। बहुत धैर्य चाहिए इस काम के लिए। आपकी आदत और बातों का असर किस तरह बच्चों पर आता है, मां-बाप जानते ही नहीं। एक गर्भवती काउंसलिंग के लिए आई थी, वह पूरा दिन स्क्रीन (मोबाइल, टीवी) देखती थी। वो काउंसलिंग से ठीक हो गई, लेकिन 3 साल बाद वह बच्ची को लेकर आई। वह आक्रामक, बेचैन और भावनात्मक रूप से अनियंत्रित थी। चीजें फेंकती, खुद को चोट पहुंचाती और किसी के भी स्पर्श से दूर भागती थी। उस बच्ची को मैंने एक साल तक वॉटर थेरेपी और कलर थेरेपी दी। धीरे-धीरे पानी की शांत लय उसके मन को स्थिर करने लगी और रंग उसके भीतर दबी भावनाओं को बाहर लाने लगे। जब वह पहली बार हंसी तो लगा जैसे किसी बंद कमरे की खिड़की खुली हो। बच्ची एडीएचडी (अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी डिसऑर्डर) से पीड़ित थी। मां के मोबाइल देखने का असर कहीं न कहीं बच्ची पर भी आया था। एक मां 15 साल के बेटे को लाई। वह गेमिंग में इतना डूब चुका था कि मां के गहने तक बेच आया था। उसने कहा, ‘मैम, मैं बुरा इंसान हूं। मुझे कोई पसंद नहीं करता।’ उस वाक्य ने मुझे भीतर तक झकझोरा। कई सेशन में मैंने उसका भरोसा जीता। समय लगा लेकिन वह ठीक हो गया। 5 साल की बच्ची ने एक हादसे में मां खो दिया। वह मेरे पास आई तो बोली, ‘मैम, मैं मम्मी को देख सकती हूं। वो मुझसे बात करती हैं’ उसकी आंखों में इतना विश्वास था कि कुछ पलों के लिए मुझे भी लगा जैसे वह सच कह रही हो। मैंने उसे रोका नहीं। मैं उसकी दुनिया में गई, उसके दर्द को वहीं से पकड़ा जहां वह था। उससे बात की और पुरानी सुखद अनुभवों को यादों को तब्दील किया। उसे ठीक होने में आठ महीने लगे।
– जैसा बकुल महेश माथुर को बताया