यह तस्वीर नीमकाथाना के स्यालोदड़ा की पहाड़ियों की है। ये अरावली पर्वतमालाओं में से एक है। हरियाली वाला हिस्सा राजस्थान में है, जबकि दूसरी ओर छलनी हुई पहाड़ी हरियाणा में। प्रदेश में अरावली में खनन पर रोक है, जबकि हरियाणा में नियम लागू नहीं होता। वहां जिस भूभाग में पौधरोपण है, उसी को अरावली का भाग मानते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि 100 मी. से ऊंचे पहाड़ ही अरावली का हिस्सा होंगे। आदेश लागू हुआ तो राजस्थान के कई जिलों में असर होगा। सीकर की 90 % अरावली पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊंची हैं। अभी इन्हें अरावली मानकर प्रतिबंध लागू हैं। नई परिभाषा लागू होते ही ये प्रतिबंध समाप्त हो जाएंगे। पर्यावरणविद् कैलाश मीणा का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कानूनी परिभाषा के नाम पर अरावली को खत्म करने की साजिश है। पहाड़ की पहचान ऊंचाई से नहीं, भूगर्भीय संरचना से होती है। अरावली को 100 मी. ऊंचाई के मानदंड से परिभाषा नई नहीं
“अरावली पर खतरा नहीं है। इसे 100 मी. ऊंचाई के मानदंड से परिभाषित करना नया नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस शासनकाल में तय हुआ था। 2003 में जिलेवार नक्शे भी तत्कालीन सीएम अशोक गहलोत ने जारी किए थे।”
-राजेंद्र राठौड़, पूर्व नेता प्रतिपक्ष केंद्र-राज्य सरकार अरावली का चीरहरण कर रही हैं
“एक पेड़ मां के नाम लगाने वाले भाजपा नेता अरावली को खोखला करने जा रहे हैं। केंद्र व राज्य सरकार अरावली का चीरहरण कर रही हैं। खनन माफियाओं को पनपाने के लिए सरकार ने जनता का मौत का फरमान जारी किया है।”
– टीकाराम जूली, नेता प्रतिपक्ष
