सुप्रीम कोर्ट द्वारा 100 मीटर ऊंची पहाड़ियों की ही अरावली मानने की नई परिभाषा को मंजूरी के बाद उदयपुर सहित प्रदेश के 15 जिलों में चिंता है। क्योंकि इस मानक से अरावली की 90% से ज्यादा पहाड़ियां संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी। विरोध-प्रदर्शनों के बीच दैनिक भास्कर ने अरावली को लेकर सरकारी दावों और जमीनी हकीकत की पड़ताल की। सामने आया कि यह खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। एक ओर बार-बार यह कहा जा रहा है कि कुल खनन क्षेत्र में सिर्फ 1.10 प्रतिशत ही (वैध खनन) है। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) और फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) की रिपोर्टें साफ बता रही हैं कि समस्या वैध खनन नहीं, बल्कि अवैध खनन का अंधाधुंध विस्तार है। 1.10 प्रतिशत तो केवल लाइसेंस शुदा पट्टों का आंकड़ा है। इसका अवैध खनन से न तो कोई गणितीय संबंध है और नहीं नैतिक। इसे ढाल बनाकर अवैध खनन छिपाने की लगातार कोशिशें की जा रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह गंभीर बौद्धिक छल है। सीईसी व एफएसआई की सैटेलाइट स्टडी के अनुसार 2018 तक अरावली पर्वतमाला का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा अवैध खनन से प्रभावित या नष्ट हो चुका। यह कोई अनुमान नहीं, बल्कि गायब हो चुकी पहाड़ियों, सपाट किए पर्वतों, वन भूमि के खनन में रूपांतरण और 2002 से लागू सुप्रीम कोर्ट के खनन निषेध आदेशों की खुली अवहेलना पर आधारित निष्कर्ष है। अब सवाल यह है कि जब अवैध खनन पूरी तरह रुका ही नहीं, तो पिछले आठ वर्षों में यह नुकसान कहां तक पहुंच गया होगा? अब 90 प्रतिशत पहाड़ियों को अरावली नहीं माना गया तो इससे अरावली पर्वत शृंखला का तबाह होना तय है। विशेषज्ञों की नजर में 3 सीन : हर साल कम से कम 0.5 फीसदी नया इलाका बना सीईसी और एफएसआई ने 2018 में ही चेताया था कि अरावली का 25 प्रतिशत हिस्सा अवैध खनन की चपेट है। इसके बाद का सटीक वार्षिक सरकारी डेटा सार्वजनिक नहीं है। इसलिए विशेषज्ञों ने यथार्थवादी मान्यताओं के आधार पर तीन परिदृश्य तैयार किए हैं। पहला न्यूनतम वृद्धि – इसमें माना गया कि दावों के बावजूद अवैध खनन पूरी तरह नहीं रुका और औसतन 0.5 प्रतिशत प्रति वर्ष नया क्षेत्र प्रभावित हुआ। यानी 8 साल में 4 प्रतिशत अतिरिक्त नुकसान हुआ। अब तक प्रभावित क्षेत्र करीब 29 प्रतिशत पहुंचता है। दूसरा मध्यम या व्यावहारिक – इसमें औसतन 1 प्रतिशत प्रति वर्ष वृद्धि मानी गई। इससे 2025 तक नुकसान 33 प्रतिशत तक पहुंचता है। तीसरा आक्रामक – इसे वास्तविकता के करीब मानते हुए में 1.5 से 2 प्रतिशत प्रति वर्ष नया नुकसान आंका गया। इस लिहाज से कुल प्रभावित हिस्सा 37 से 41 प्रतिशत तक हो सकता है। 1.10% वैध खनन का भ्रम और असली अपराध
सरकारी स्तर पर बार-बार दोहराया जाने वाला 1.10 प्रतिशत वैध खनन का आंकड़ा असल मुद्दे से ध्यान भटकाने का जरिया बन गया है। यह प्रतिशत केवल लाइसेंस वाले पट्टों को दर्शाता है, न कि जमीन पर हो रहे कुल खनन को। अवैध खनन का इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध ही नहीं है। सीईसी की रिपोर्टों में साफ कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के 2002 से चले आ रहे खनन निषेध आदेशों के बावजूद राजस्थान-हरियाणा बेल्ट में बड़े पैमाने पर अवैध खनन जारी रहा। इसका असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। पहाड़ियां गायब होने से भूजल रिचार्ज, जैव विविधता और स्थानीय जलवायु पर स्थायी चोट पड़ी है। यह केवल पर्यावरणीय नुकसान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के साथ अपराध है। अरावली को बचाने के दावे कागजों पर नहीं, बल्कि पहाड़ियों पर दिखने चाहिए। भास्कर एक्सपर्ट : प्रो. महेश शर्मा, पर्यावरणविद