‘भगवान शिव का अनुसरण करने से जीवन में आत्मज्ञान का भाव और सच्चाई की राह पर चलने की ताकत मिलती है जिंदगी में तीन भाव को हमें अपनाना होगा। साधना और अध्यात्म ठहराव देते हैं, सोचने का भाव देते हैं। इससे न्याय और धर्म का महत्व पता चलता है। भगवान शिव अपने प्यारे भक्तों को खुद ये भाव देते हैं कि वह प्रेम-करुणा और सच्चाई के रास्ते पर चल सकें।’ यह बातें श्री गुरु अमरदास नगर स्थित पारदेश्वर सिद्धपीठ श्री गौरी शंकर मंदिर में जारी शिवपुराण कथा के दूसरे दिन कथावाचक आचार्य शेषेन्द्र मणि जी महाराज ने कहीं। आचार्य ने कहा कि शिव पुराण के अनुसार, प्रथम शिवलिंग जिसे ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है, का प्राकट्य भगवान शिव की सर्वोच्चता और निराकार से साकार रूप में आने का प्रतीक है। यह भगवान शिव के निराकार और साकार रूपों के मिलन का प्रतीक है। मधुर शंखनाद और स्वर लहरियों के बीच आचार्य शेषेन्द्र मणि महाराज ने कहा िक जब सृष्टि के सृजनकर्ता भगवान ब्रह्मा और पालनकर्ता भगवान विष्णु के मध्य अपनी-अपनी श्रेष्ठता को सिद्ध करने की होड़ ने जब द्वंद का रूप लेना शुरू किया, तब अचानक उन दोनों के बीच एक भीषण और विशाल अग्नि स्तंभ यानी ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। यह स्तंभ करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी था। न इसका कोई आदि यानी आरंभ था और न ही कोई अंत। इस अद्भुत दृश्य को देखकर दोनों देव आश्चर्यचकित रह गए और उन्होंने द्वंद रोक दिया। उन्होंने कहा कि ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने निर्णय लिया कि जो भी इस स्तंभ के अंतिम को पहले ढूंढ लेगा, वही, सर्वश्रेष्ठ माना जाएगा। इसके चलते भगवान विष्णु ‘वराह’ का रूप धारण कर स्तंभ का निचला छोर (जड़) खोजने पाताल की ओर गए। इसी तरह भगवान ब्रह्मा ‘हंस’ का रूप धारण कर स्तंभ का ऊपरी छोर खोजने आकाश की ओर उड़ चले। हजारों वर्षों तक प्रयास करने के बाद भी भगवान विष्णु को उस स्तंभ का कोई अंत नहीं मिला और वे निराश होकर वापस लौट आए। ब्रह्मा जी भी ऊपर का छोर नहीं पा सके। लेकिन नीचे आते समय उन्होंने एक केतकी (केवड़ा) के फूल को नीचे गिरते हुए देखा। ब्रह्मा जी ने केतकी को बहका लिया और कहा कि वह विष्णु जी के सामने गवाही दे कि ब्रह्मा जी ने स्तंभ का शिखर देख लिया है। स्वार्थवश केतकी के फूल ने उनकी झूठी गवाही भी दे दी। जैसे ही ब्रह्मा जी ने झूठ बोला, उस अग्नि स्तंभ से भगवान सदाशिव अपने साकार रूप में प्रकट हुए। उनकी हुंकार से समस्त ब्रह्मांड कांप उठा। उन्होंने विष्णु जी की सत्यवादिता से प्रसन्न होकर उन्हें अपने समान पूज्य होने का वरदान दिया। ब्रह्मा जी के झूठ पर क्रोधित होकर शिव जी ने अपना भैरव रूप प्रकट किया और ब्रह्मा जी का वह पांचवां सिर काट दिया जिसने झूठ बोला था।
