नमस्कार, राजस्थान में निकाय चुनाव के दोनों चरण हो गए। वोटर्स को लुभाने के लिए क्या कुछ नहीं किया गया। जोधपुर में बूथ पर पूर्व मुख्यमंत्री के पैर छूने पर हंगामा खड़ा हो गया। जालोर में पूर्व विधायक की मौजूदगी में मंडल अध्यक्ष काम गिना रहे थे, एक युवक मंच पर चढ़ा और बोला-क्यों झूठ बोलते हो? भरतपुर में पहली बार की वोटर ने प्रत्याशियों को खरी-खरी सुना दी। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. आटा-गिफ्ट और गोलगप्पे का ‘लालच’ नेताजी ने अगर काम किया हो तो जनता सिर-आखों पर रख लेती है। वरना वोटर की जेब से वोट निकालना बड़ा मुश्किल। वोट पाने के लिए नेतागण क्या कुछ हथकंडा नहीं अपनाते? जयपुर में वार्ड 67 की कांग्रेस प्रत्याशी योगिता शर्मा को कुछ न सूझा तो लड़कियों को गोलगप्पे खिलाने लगीं। इधर कोटा को वार्ड 54 में कुछ लोग थैले भर-भर कर मोहल्ले में पहुंचे और गिफ्ट बांटने लगे। बालकनी से एक जागरूक व्यक्ति ने हेला लगाया- गिफ्ट बांट रहे हो या रिश्वत? अजमेर में तो हद ही कर दी। दूसरे चरण की वोटिंग से एक रात पहले वार्ड 55 में एक वैन आई। वैन में आटे के कट्टे भरे थे। कुछ लोगों ने कट्टे बांटना शुरू कर दिया। दावा किया गया कि कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थन में कट्टे बांटे जा रहे हैं। बांटने वालों को घेर लिया गया। एक व्यक्ति बोला- इस तरीके से चुनाव जीतोगे? आटे के कट्टे बांटकर इलेक्शन जीतोगे। कह रहो हो गरीबों को बांटा है। गरीबों को बांटकर खून चूसोगे बाद में। दूसरा बोला- पैसे बांटकर चुनाव जीता जाता है क्या? जो अभी आटे के कट्टे बांट रहा है वो चुनाव के बाद कितना भ्रष्टाचार करेगा। तीसरे ने कहा- पुलिस बुलाओ। सूचना पाकर अलवर गेट थाने से पुलिस पहुंच गई। वैन और ड्राइवर को थाने पहुंचा दिया गया। 2. कहीं मारा थप्पड़, कहीं पैर छूने पर हंगामा ये चुनाव नहीं आसां..बस इतना समझ लीजे..एक आग का दरिया है और डूब के जाना है। शायरी में इश्क की जगह चुनाव को सेट किया जा सकता है। क्योंकि इश्क की तरह चुनाव लड़ना भी आसान काम नहीं। बाड़मेर के धोरीमन्ना की बात है। यहां वार्ड 5 से खड़े भाजपा उम्मीदवार का रिश्तेदार पहुंचा। वह घर-घर जाकर वोट मांग रहा था। गलती से कांग्रेस प्रत्याशी के रिश्तेदार के घर भी पहुंच गया। वोट मांगते ही एक महिला ने उसके गाल पर जोरदार थप्पड़ धर दिया। इधर जयपुर के झोटवाड़ा के वार्ड 27 से भाजपा प्रत्याशी शंकर लाल की खूब कसरत हो गई। यहां सरकारी स्कूल में मतदान केंद्र बनाया गया था। प्रत्याशी बूथ पर पहुंचने वाले बुजुर्ग मतदाताओं के पैर छूने लगा। पैर छूने में प्रत्याशी को आनंद आने लगा। दो महिलाओं के पैर पकड़ते ही उन्होंने वह आशीर्वाद दिया जिसकी आकांक्षा नेताजी को थी- विजयी भव:। कसरत सफल रही या नहीं, यह रिजल्ट के दिन सामने आएगा। चुनाव में पैर छूना भी आसान काम नहीं। जोधपुर में पूर्व सीएम अशोक गहलोत परिवार के साथ वोट डालने गए थे। वहां एक के बाद एक कुछ लोगों ने उनके पैर छू लिए। इस पर बीजेपी विधि प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक ने आरोप लगाए कि पोलिंग पार्टी के कर्मचारी ने पैर छुए हैं। जिला निर्वाचन अधिकारी को शिकायत कर दी गई। शिकायत की जांच हुई। जांच में पता चला कि 3 लोगों ने पैर छुए थे। इनमें एक वोटर, दूसरा निर्दलीय प्रत्याशी का बूथ एजेंट और तीसरा चुनाव एजेंट था। पोलिंग पार्टी के कर्मचारी ने पैर नहीं छुए। 3. मंच पर जाकर सुनाई खरी-खरी जनता अगर भरी बैठी हो तो लंबी लंबी डींगें नहीं हांकनी चाहिए। बात है जालोर के रानीवाड़ा के गांव भाटीप की। यहां खेलकूद प्रतियोगिता को लेकर कार्यक्रम था। कार्यक्रम में पूर्व विधायक नारायण सिंह देवल मौजूद थे। पास में मंडल अध्यक्ष तुलसाराम माइक थामकर विकास के काम गिनाने लगे। वे बोले- मैंने पाइप लाइनें बिछवाई। पानी लेकर आया। पानी की बात सुनकर भीड़ से एक युवक उठकर मंच पर चढ़ गया। वह मंडल अध्यक्ष के ठीक सामने जाकर खड़ा हो गया और उन्हीं के माइक में उन्हें खरी-खरी सुना दी। युवक बोले- यहां पानी किसी के घर में नहीं है। झूठ बोलने की दरकार नहीं। ठीक है न? बाकी राजनीति करनी है तो किए जाओ। युवक के जोश के कारण मंच पर भभ्भड़ सा मच गया। नेताजी के आस-पास बैठे अतिथिगण ‘अरे शांति रखो भाई’ का उपदेश देने लगे। लड़का अपनी बात कहकर चला पड़ा। 4. चलते-चलते… जनता अगर प्रजा का भाव रखने लगे तो नेतागण राजाओं-बादशाहों की तरह व्यवहार करने लग जाते हैं। जबकि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि जनता के सेवक से ज्यादा कुछ नहीं। कोटा की एक कॉलोनी है जिसका नाम स्वराज एनक्लेव है। यहां रहने वाले खासे परेशान। निगम, विधानसभा और लोकसभा चुनाव के वक्त नेतागण यहां आकर वोट लेकर चले जाते हैं। लेकिन इस बार कॉलोनी वाले एकजुट हो गए। बोले- वोट का सामूहिक बहिष्कार करते हैं। कारण पूछा तो एक कॉलोनी वासी ने कहा- स्वराज एनक्लेव में नालियां खराब हैं, रोड की दुर्दशा हो रखी है। पार्क नहीं हैं। विकास के नाम पर कुछ नहीं है। यूआईटी ने लाइट तक नहीं लगाई। पहले कॉलोनाइजर ने अपने खर्चे पर लाइट लगाई थी, वे खराब पड़ी हैं। पूरी कॉलोनी अंधेरे में डूबी रहती है। रात में डर लगता है। नाले से मगरमच्छ आ जाते हैं। निगम के सफाई कर्मचारी यहां आते नहीं। हम ही पैसा जुटाकर अपने स्तर पर सफाई कराते हैं। फिर वोट देने से हमें क्या फायदा है? वोट तब मिलेगा जब हमारे काम होंगे। इसलिए हमने तय किया है कि जब तक प्रशासन का कोई बड़ा अधिकारी आकर लिखित में हमारी मांगें पूरी करने का आश्वासन नहीं देगा, तब तक हम वोट नहीं डालेंगे। भरतपुर में पहली बार की वोटर शिवानी बैंसला से पत्रकार ने उसका अनुभव पूछा। शिवानी ने तगड़ी भाषा में नेतागण को नसीहत दे दी। बोलीं- हम अपना प्रत्याशी चुनते हैं ताकि वो हमारे हक की बात रखे। लेकिन ये नेता चुने जाने के बाद अपना फर्ज भूल जाते हैं। गाड़ियों में शोशेबाजी करते घूमते हैं और 5 साल यूं ही निकाल देते हैं। इन्हें चुनाव के वक्त होश आता है तो ये नमस्ते-नमस्ते करते हुए फिर वोट मांगने पहुंच जाते हैं। चुनाव लड़ने वाले को इंसानियत के बेसिक नियम नहीं भूलने चाहिएं। जो धरातल से जुड़कर रहेगा वही बड़ा नेता बनेगा। अपनी जेबें भरने की जगह अगर ये नेता इंसानियत के लिए काम करें तो हमारा हिंदुस्तान कहां से कहां पहुंच जाएगा। इनपुट सहयोग- सुनील जैन (अजमेर), विजय कुमार (बाड़मेर), जयदीप पुरोहित, अरविंद सिंह, अंकित ढाका (जोधपुर), महेश शर्मा (बयाना, भरतपुर), शक्ति सिंह (कोटा)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगाी।
