नगर निकाय चुनावों के नतीजे आ गए हैं। प्रदेश के 10 नगर निगमों में से बीजेपी 4 में आसानी से बोर्ड बनाते हुए नजर आ रही है। वहीं, कांग्रेस को बीकानेर नगर निगम में पूर्ण बहुमत मिला है और पाली में निर्दलीयों की मदद से आसानी से बोर्ड बना लेगी। अलवर में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी है। जोधपुर, अजमेर और भरतपुर नगर निगम में स्थिति फिलहाल साफ नहीं है। इसके साथ ही जिन निगमों में बहुमत की स्थिति स्पष्ट है, वहां मेयर के दावेदारों ने लॉबिंग भी शुरू कर दी है। जयपुर में वैश्य समाज से मेयर बनाया जा सकता है। वहीं, उदयपुर में जैन या ब्राह्मण चेहरे पर दांव संभव है। इसी तरह कोटा, बीकानेर, भीलवाड़ा और पाली में कई नेता रेस में लगे हैं। स्पष्ट बहुमत और बहुमत के करीब वाले 7 नगर निगमों में कौन-कौन से चेहरे मेयर बनने की रेस में हैं? कौनसे- समीकरण उनके पक्ष में हैं? जोधपुर, अजमेर और भरतपुर में किसका बोर्ड बनने की संभावना है? पढ़िए स्पेशल स्टोरी में…
1. जयपुर नगर निगम : वैश्य समाज से बन सकता है मेयर बीजेपी का कोर वोटर ब्राह्मण, वैश्य, राजपूत और सामान्य वर्ग को माना जाता है। जानकारों का मानना है कि पार्टी ने जयपुर की सांगानेर विधानसभा सीट से भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाकर ब्राह्मण कोटे को भर दिया है। वहीं, विद्याधर नगर सीट से दीया कुमारी को उप मुख्यमंत्री बना रखा है। वे राजपूत समाज से आती हैं। जयपुर की सांसद मंजू शर्मा भी ब्राह्मण हैं। ऐसे में पार्टी वैश्य समाज से मेयर बनाकर सामाजिक और जातिगत संतुलन को साधना चाहती है। मेयर की 5 सीटें महिलाओं के लिए पहले से आरक्षित हैं। ऐसे में पार्टी किसी पुरुष प्रत्याशी को ही जयपुर का मेयर बनाना चाहती है। उनमें ये प्रमुख दावेदार हैं… सुनील कोठारी : मेयर पद के सबसे प्रबल दावेदारों में नाम चल रहा है। कोठारी का जयपुर के जेम्स एंड ज्वेलरी बिजनेस में बड़ा नाम है। वे पार्टी में कार्यालय प्रभारी, प्रदेश मंत्री और प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर भी रहे हैं। पार्टी ने उन्हें निर्वतमान मेयर कुसुम यादव का टिकट काटकर वार्ड-112 से प्रत्याशी बनाया था। इसके अलावा वे जैन समुदाय से आते हैं। पार्टी वैश्य में भी जैन को मौका देकर इस महत्वपूर्ण कम्युनिटी को साध सकती है। पुनीत कर्नावट : मेयर की दौड़ में दूसरा सबसे प्रबल दावेदार पुनीत कर्नावट को माना जा रहा है। कर्नावट निर्वतमान डिप्टी मेयर हैं। छात्र राजनीति से उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत की थी। एबीवीपी के कार्यकर्ता रहे हैं। प्रदेश युवा मोर्चा में प्रदेश मंत्री भी रहे। उन्हें मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का नजदीकी माना जाता है। वे विधानसभा चुनाव में मालवीय नगर सीट से दावेदारी भी जता रहे थे। लेकिन उस समय पार्टी ने कालीचरण सराफ को मौका दिया था। विमल अग्रवाल : वार्ड-135 से जीते प्रत्याशी विमल अग्रवाल भी मेयर की रेस में हैं। उनकी पहचान पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता की मानी जाती है। जिला उपाध्यक्ष और दो बार के पार्षद हैं। युवा मोर्चा के जिलाध्यक्ष भी रह चुके हैं। हालांकि, घनश्याम तिवाड़ी के साथ बीजेपी छोड़कर उनकी बनाई दीनदयाल वाहिनी पार्टी में चले गए थे। लेकिन फिर से बीजेपी मे लौट आए। इसी तरह से वार्ड-98 से प्रत्याशी सुभाष चंद्र सिंघी भी मेयर पद के लिए चौंकाने वाला नाम हो सकता है। सिंघी आरएसएस के कार्यक्रमों में हमेशा प्रमुख सहयोगी रहे हैं। पूर्व मंत्री और राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी के करीबी हैं। शहर के प्रमुख व्यवसायी भी हैं। सुभाष सिंघी पार्टी के आर्थिक प्रकोष्ठ से जुड़े रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक जयपुर में यदि भाजपा हाइब्रिड मॉडल अपनाती है तो वैश्य समाज के किसी नॉन पार्षद नाम पर भी विचार हो सकता है। इनमें खंडेला ट्रस्ट के संस्थापक पुरुषोत्तम गुप्ता सहित कई नामों की चर्चा है। 2. उदयपुर नगर निगम : जैन-ब्राह्मण चेहरे पर दांव संभव उदयपुर नगर निगम में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला है। पार्टी ने यहां 80 में से 53 सीटें जीती हैं। यहां प्रमोद सामर मेयर पद के सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। सामर बीजेपी सहकारिता प्रकोष्ठ के संयोजक हैं। राज्यसभा चुनाव में भी उनके नाम की चर्चा थी। उदयपुर में बीजेपी पार्षदों में उम्र और अनुभव के आधार पर सबसे वरिष्ठ नेता हैं। उन्हें पार्षद का चुनाव लड़ाने के साथ ही उनके मेयर बनने की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। प्रदेश और दिल्ली के नेताओं से सीधे संपर्क उन्हें इस पद का प्रबल दावेदार बनाते हैं। इसके अलावा पूर्व जिलाध्यक्ष दिनेश भट्ट भी मेयर की दौड़ में हैं। संघ में अच्छी पकड़ और जातिगत समीकरण उनकी दावेदारी को मजबूत बनाते हैं। शहर बीजेपी अध्यक्ष राजपूत हैं और विधायक ताराचंद जैन समुदाय से आते हैं। ऐसे में अगर ब्राह्मण को मौका मिलता है तो दिनेश भट्ट को प्रमोद सामर से पहले प्राथमिकता मिल सकती है। भट्ट उस समय भी चर्चा में आए थे, जब उन्होंने टिकट मिलने से पहले ही बीजेपी के प्रत्याशी के तौर पर नामांकन भर दिया था। वहीं राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया के दोनों दामादों के भाई आकाश और अतुल चंडालिया भी इस बार चुनाव में जीत गए हैं। ऐसे में अतुल चंडालिया का नाम भी मेयर पद के लिए चलाया जा रहा है। 3. कोटा : लोकसभा स्पीकर की पसंद को प्राथमिकता कोटा नगर निगम में मेयर की सीट महिला ओबीसी के लिए रिजर्व है। यहां बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला है। इस सीट पर बीजेपी की अनुसुइया गोस्वामी और सीमा चौधरी का नाम प्रबल दावेदारों में शामिल है। अनुसुइया गोस्वामी बीजेपी संगठन में प्रदेश मंत्री भी रह चुकी हैं और बीजेपी महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष भी रही हैं। इन्हें लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला के खेमे में माना जाता है। वहीं, सीमा चौधरी स्पीकर ओम बिड़ला के वार्ड-83 से चुनाव जीतकर आई हैं। सीमा के पति धीरेन्द्र चौधरी पहले पार्षद रह चुके हैं। जो बिड़ला खेमे के भरोसेमंद नेताओं में शामिल हैं। जानकारों के मुताबिक कोटा के मेयर पद पर लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला की पसंद पर आखिरी मुहर लगाई जा सकती है। 4. बीकानेर नगर निगम : कल्ला के भतीजे को मिल सकता है मौका केवल बीकानेर नगर निगम में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला है। यहां मेयर पद के प्रबल दावेदारों में पूर्व मंत्री बीडी कल्ला के भतीजे अनिल कल्ला का नाम सबसे आगे है। कल्ला के विधानसभा क्षेत्र बीकानेर पश्चिम के वार्डों से कांग्रेस ने अच्छी जीत दर्ज की है। अनिल कल्ला अपनी आक्रामक पॉलिटिक्स के लिए जाने जाते हैं। लंबे समये बीकानेर में राजीव गांधी क्लब के जरिए समाज सेवा से जुड़े हुए हैं। हालांकि चर्चा यह भी है कि अगर अनिल कल्ला मेयर बनते हैं तो भविष्य में बीडी कल्ला की विधायकी की दावेदारी कमजोर पड़ सकती है। इस स्थिति में दिलीप बांठिया मेयर बन सकते हैं। बांठिया पहले पार्षद और जिला उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनका पक्ष इसलिए भी मजबूत है कि वे जिस गंगाशहर इलाके से चुनाव जीते हैं, वह आरएसएस का गढ़ है और यहां पहली बार कांग्रेस को बढ़त मिली है। तीसरे प्रबल दावेदारों में पूर्व यूआईटी चेयरमैन मकसूद अहमद का नाम है। मकसूद पहले सभापति भी रह चुके हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का वीटो लगता है तो वे भी मेयर बन सकते हैं। एक फैक्ट यह भी है कि बीकानेर में बड़ी संख्या में मुस्लिम प्रत्याशियों को जीत मिली है। कांग्रेस भी उन्हें मेयर बनाकर अल्पसंख्यक समुदाय के साथ खड़े होने का मजबूत संदेश दे सकती है। 5. भीलवाड़ा नगर निगम : सुमन ओझा-पूर्णिमा जैन में मुकाबला यहां बीजेपी ने बहुमत से ज्यादा 70 में से 45 सीटें जीत ली हैं। भीलवाड़ा नगर निगम में मेयर की सीट जनरल महिला के लिए रिजर्व है। यहां वार्ड-60 से जीतकर आई सुमन ओझा और वार्ड-61 से जीतीं पूर्णिमा जैन के बीच मेयर पद के लिए सीधा मुकाबला है। सुमन ओझा पहले भी एक बार पार्षद रह चुकी हैं। उन्हें सांसद दामोदर अग्रवाल और पूर्व मेयर राकेश पाठक के खेमे से माना जाता है। वहीं, पूर्व विधायक विट्ठल शंकर अवस्थी के खेमे से आने वाली पूर्णिमा जैन का नाम भी मेयर प्रत्याशी के तौर पर चल रहा है। पूर्णिमा के पति विजय पोखरणा भी पार्टी में जिला प्रवक्ता हैं। भीलवाड़ा में जैन समुदाय बड़ी संख्या में है। ऐसे पार्टी उनके नाम पर भी विचार कर सकती है। 6. अलवर नगर निगम : बीजेपी का बोर्ड बनना तय
नगर निकाय चुनावों में अलवर के परिणामों ने चौंकाया है। यहां बीजेपी के पास पूर्ण बहुमत तो नहीं है, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि निर्दलीयों की सहायता से राह आसान हो सकती है। निगम में कुल 65 वार्ड हैं, जिनमें से बीजेपी के 28 और कांग्रेस के 23 प्रत्याशी पार्षद का चुनाव जीते हैं। बहुमत के लिए 33 पार्षदों की जरूरत है। बीजेपी को केवल 5 निर्दलीय पार्षदों का समर्थन चाहिए। जबकि 13 निर्दलीय जीते हैं। अगर बीजेपी का बोर्ड बनता है तो मेयर की रेस में 2 चेहरे सबसे प्रमुख हैं। पूर्व चेयरमैन रहे अजय अग्रवाल की पत्नी सुमनलता अग्रवाल और पुरुषोत्तम मनचंदा की पुत्रवधु नेहा मनचंदा, दोनों मजबूत हैं। पुरुषार्थी समाज से होने के कारण नेहा मनचंदा का नाम सोशल इंजीनियरिंग के लिहाज से प्रबल माना जा रहा है। तीसरी दावेदार के तौर पर नीलेश खंडेलवाल की पुत्रवधु अपूर्वा शर्मा का नाम चर्चा में है। 7. पाली नगर निगम : कांग्रेस का बोर्ड बनना तय यहां 65 वार्डों में से कांग्रेस ने 29 वार्ड में जीत दर्ज की है। कांग्रेस बहुमत से महज 4 सीट दूर है। 15 निर्दलीय जीते हैं। कांग्रेस नेताओं का दावा है कि वे निर्दलीयों के साथ से आसानी से बोर्ड बना लेंगे। अगर कांग्रेस का बोर्ड बनता है तो मेयर की दावेदारी में वार्ड-38 से चुनाव जीती कांग्रेस नेता प्रदीप हिंगड़ की पत्नी राजबाला हिंगड़ का नाम सबसे प्रबल माना जा रहा है है। कांग्रेस विधायक भीमराज भाटी और शहर ब्लॉक अध्यक्ष का उन्हें समर्थन है। जयपुर तक भी उनकी अच्छी लॉबिंग है। इनके अलावा सुमित्रा जैन भी मेयर पद के दावेदारों में शामिल हैं। वे जैन समुदाय से आती हैं। कांग्रेस प्रदेश कार्यकारिणी में भी रह चुकी हैं। उनकी जीत इसलिए भी बड़ी हो जाती है, क्योंकि उन्होंने बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस के मजबूत बागी को हराया है। वहीं, तीसरे दावेदार के तौर पर अनामिका सोलंकी मेवाड़ा का नाम भी चर्चा में है। भरतपुर : जिसकी सत्ता, उसका बोर्ड
नगर निकाय के चुनावों में सबसे ज्यादा चौंकाने वाले परिणाम भरतपुर से आए हैं। भरतपुर नगर निगम में निर्दलीयों ने 65 में से 36 सीटें जीतकर बहुमत जुटा लिया है। लेकिन इतिहास पर नजर डालें तो यह समीकरण भी बीजेपी के पक्ष में जाता है। भरतपुर में हमेशा निर्दलीयों का बोलबाला रहता है। साल 2019 के चुनावों में भी यहां दोनों पार्टियों से ज्यादा निर्दलीय प्रत्याशी जीते थे। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, ऐसे में बोर्ड कांग्रेस का बना और अभिजीत जाटव मेयर बने थे। इससे पहले साल 2014 में निर्दलीय ज्यादा जीते थे, लेकिन सत्ता बीजेपी की थी तो बोर्ड-मेयर बीजेपी का बना था। ऐसे में राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यहां निर्दलीय सत्ता के साथ ही जाएंगे। अजमेर में 36 साल बाद बोर्ड बनाने के करीब कांग्रेस, जोधपुर में पलड़ा बराबर
अजमेर नगर निगम में करीब 36 साल बाद कांग्रेस बोर्ड बनाने के करीब पहुंच गई है। अजमेर नगर निगम की 80 सीटों से कांग्रेस ने 37 और बीजेपी ने 32 सीटें जीती हैं। ऐसे में कांग्रेस बहुमत के आंकड़े से केवल 4 सीटें पीछे है। कांग्रेस का दावा है कि उसके तीनों बागी कांग्रेस खेमे में शामिल हो गए हैं और अन्य को साधकर वो बोर्ड बना लेगी। जोधपुर नगर निगम की 100 सीटों में से बीजेपी-कांग्रेस ने 44-44 सीटें जीती हैं। 10 वार्ड निर्दलीयों और एक वार्ड आरएलपी के खाते में गया है। वहीं एक वार्ड का चुनाव परिणाम रुका हुआ है। प्रदेश में सत्ता होने के कारण भाजपा के पास बोर्ड बनाने का एडवांटेज नजर आ रहा है। वहीं, कांग्रेस की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की प्रतिष्ठा सीधे इस निगम से जुड़ी हुई है। ऐसे में सियासी जानकारों का मानना है कि गहलोत की रणनीति यहां बीजेपी पर भारी भी पड़ सकती है। निर्दलीय किंग मेकर की भूमिका में हैं। … ये खबरें भी पढ़ें… 1. रिजल्ट में ‘काकाजी’ की एंट्री का असर:जनता ने भाजपा-कांग्रेस को डराकर जिताया; 140+ निकायों में निर्दलीय खोलेंगे सत्ता का ताला राजस्थान के निकाय चुनाव के नतीजों का एक वाक्य में विश्लेषण करें तो भाजपा जीती है, लेकिन कांग्रेस भी बुरी तरह से नहीं हारी है। निकाय चुनाव में ‘काकाजी’ की एंट्री का असर भी दिख रहा है।वैसे चुनाव संख्या के हिसाब से भाजपा 309 निकायों में से 163 में जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर आगे है। कांग्रेस 103 पर है, लेकिन ये आंकड़े अधूरी सच्चाई हैं। पूरी खबर पढ़ें… 2. पूर्व सीएम गहलोत और केंद्रीय मंत्री शेखावत अपने वार्ड हारे:पायलट के क्षेत्र में जीती कांग्रेस; राजस्थान निकाय चुनाव में पहली बार ‘आप’ का बोर्ड 3. राजस्थान- 10 में से 4 नगर निगमों में निर्दलीय किंगमेकर:पाली-अजमेर के रिजल्ट ने चौंकाया; बीकानेर में कांग्रेस, भीलवाड़ा-उदयपुर में भाजपा बनाएगी मेयर 4. भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों को 1-1 वोट मिला:सीकर में कांग्रेस-निर्दलीय समर्थक भिड़े, पत्थर फेंके; वसुंधरा राजे के गढ़ झालावाड़ में कांग्रेस जीती 5. जयपुर, जोधपुर, कोटा में मेयर-डिप्टी मेयर के चुनाव स्थगित:राज्य निर्वाचन आयोग नए सिरे से जारी करेगा कार्यक्रम, EVM खराबी से रिजल्ट अटका 6. भाजपा–कांग्रेस से टिकट लाए, परिवार के वोट भी नहीं मिले:कांग्रेस में पिता–पुत्र और पति–पत्नी की जोड़ी दहाई भी नहीं छू पाई, भाजपा प्रत्याशी को मिला महज एक वोट 7. BJP-कांग्रेस के वोट शेयर में 1% से कम अंतर:आरएलपी-आप सहित 5 पार्टियों को नोटा से कम वोट, भाजपा ने कांग्रेस से 566 वार्ड ज्यादा जीते
