कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर कर लौटे चंडीगढ़ के रचित गोयल और उनके साथियों के लिए यात्रा में एक दिन की देरी जिंदगी बचाने वाली साबित हुई। जिस दिन उनका दल कैलाश की चढ़ाई करने वाला था, उसी दौरान उनके कुछ साथियों की तबीयत अचानक बिगड़ गई। सांस लेने में दिक्कत के कारण दल ने यात्रा एक दिन आगे बढ़ा दी। उस वक्त किसी को अंदाजा नहीं था कि यह फैसला उन्हें एक बड़े हादसे से बचा सकता है। अगले दिन उन्हें नेपाल में हुए हादसे की जानकारी मिली तो रचित और उनके साथी सन्न रह गए। रचित कहते हैं, उन्हें लगता है कि यात्रा में देरी बाबा का आशीर्वाद थी। वरना वह भी त्रासदी का शिकार हो गए हो। अब सारी यात्रा को प्वाइंट में जानिए 18 अगस्त को शुरू की थी यात्रा रचित गोयल के मुताबिक 18 अगस्त को चंडीगढ़ से कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए निकले थे। 21 लोगों के ग्रुप में चेन्नई, मुंबई और दिल्ली के लोग शामिल थे। हम जहाज से काठमांडू पहुंचे थे। वहां पशुपतिनाथ जी के दर्शन किए और आगे की यात्रा शुरू की।हम यम द्वार पहुंचे, जहां से हमने करीब 51 किलोमीटर की पैदल यात्रा शुरू की। करीब 16 किलोमीटर पैदल चलकर यात्रा की। सुबह पता चला है कि भूकंप आया 25 अगस्त की रात को बारिश बहुत तेज हो रही थी। लोगों ने कहा कि यहीं रुक जाइए, इसलिए हम वहीं रुक गए। हमारे 21 लोगों के ग्रुप में से 16 लोग ही आगे यात्रा कर रहे थे, क्योंकि चार लोगों की तबीयत खराब हो गई थी। इस वजह से हमारा प्रोग्राम भी थोड़ा डिले हो गया था। उस समय हम पर्वत से करीब 500 किलोमीटर दूर थे। रात को हम सो रहे थे और बहुत तेज बारिश हो रही थी। सुबह पता चला कि भूकंप आया है। इसके बाद सुबह हमने दोरमला जाने के लिए यात्रा शुरू की। वहां सीधी चढ़ाई थी। हमें बाढ़ का पता नहीं, परिवार टेंशन में लेकिन हमें नहीं पता था कि नीचे बाढ़ आई है। रास्ते में हमें पता चलना शुरू हुआ कि स्थिति ठीक नहीं है। आगे पता चला कि इमिग्रेशन सेंटर बंद हो गया है और अब दूसरी जगह से इमिग्रेशन करवाना पड़ेगा। परिवार से दोपहर करीब 2 से 3 बजे के बीच संपर्क हुआ। परिवार वालों ने बताया कि आपसे संपर्क नहीं हो पा रहा था। हमने उन्हें बताया कि हम बिल्कुल ठीक हैं, सुरक्षित हैं, आप घबराइए मत।इसके बाद हमें बताया गया कि जिस इमिग्रेशन सेंटर से हमें क्लीयरेंस लेनी थी, वह तबाह हो गया है। हमें अपना रूट बदलना पड़ेगा।हम एक रात और रुके। वरना हम भी त्रासदी का शिकार हो गए होते इसके बाद हमने हिल्सा से अपनी इमिग्रेशन करवाई। रूट बदलने की वजह से यात्रा में दो दिन और लग गए। बाबा की कृपा थी, वरना हम भी इस त्रासदी का शिकार हो जाते। जो लोग वहां फंसे हुए हैं, उनके साथ जो हुआ, उसका हमें बहुत दुख है। हम सिलिकोट से हेलिकॉप्टर के जरिए नेपालगंज पहुंचे। इसके बाद फ्लाइट से अपने-अपने शहर पहुंचे और अपनी यात्रा पूरी की। यात्रा के दौरान अगर किसी को सांस लेने में दिक्कत हुई तो हम उनकी मदद करते रहे। वहां जितने लोग पहुंच रहे थे, सभी का एक ही उद्देश्य था कि बाबा के दर्शन करके सुरक्षित वापस लौटना है।
