न व्याधिः न च पापं च न दैन्यं न च दुःखिता। नास्ति राज्ञः प्रजास्वेवं रामे राज्यमुपासति॥ अर्थात जब भगवान श्रीराम राज्य कर रहे थे, तब उनकी प्रजा में न कोई बीमार था, न कोई पापी था, न कोई दरिद्र था और न ही कोई दुखी व्यक्ति था। रामराज्य में सभी स्वस्थ, सुखी और सुरक्षित थे। रामराज्य की बात इसलिए क्योंकि मौका दिवाली का है। उत्सव का है। मंगलवार दोपहर तक पूरा प्रदेश इसी उत्सव के उत्साह में था, लेकिन फिर आई दर्दनाक खबर…जैसलमेर में एसी स्लीपर बस में लगी आग में 21 लोगों की मौत। दिखने में भले ये हादसा लगे, लेकिन है नहीं। ये नरसंहार है। पिछले दिनों एक वीडियो आया था, जिसमें डिप्टी सीएम प्रेमचंद बैरवा रोडवेज बस में चेकिंग के लिए चढ़े थे। यहां पर कंडक्टर ने उन्हें नहीं पहचाना था। यहां तो सिर्फ कंडक्टर ने उपमुख्यमंत्री को नहीं पहचाना था, लेकिन कई ऐसे जिम्मेदार हैं, जो न किसी सरकार को जानते हैं और न सिस्टम को। इस नरसंहार के दोषी ऐसे ही जिम्मेदार हैं। ऐसा नहीं होता तो 8 दिन पहले सड़क पर आई नई बस आग का गोला नहीं बनती। बस के एसी में शॉर्ट सर्किट से 21 लोग जिंदा जल गए। 14 लोग जिंदगी और मौत से लड़ रहे हैं। कई लोग राख में तब्दील हो गए। अब उनकी पहचान करना तक मुश्किल हो रहा है। सवाल ये है कि बस में जुगाड़ का AC (मॉडिफिकेशन) लगाने की अनुमति किसने दी? उदयपुर, जोधपुर, भीलवाड़ा और नाथद्वारा में अवैध कारखानों में 1 से 1.5 करोड़ की लागत वाली ये बसें महज 60 लाख रुपए में तैयार कर दी जाती हैं। रावण बना भ्रष्ट सिस्टम सुरक्षा की लक्ष्मण रेखा लांघने को उकसा रहा अवैध रूप से बन रही ये बसें कई बार आग का गोला बनी हैं। ऐसा नहीं है कि परिवहन विभाग को इसकी जानकारी नहीं है, लेकिन सिर्फ कुछ जुर्माना लगाकर जिंदगी से खेलने वाले इन कारोबारियों को छोड़ दिया गया। क्या इन मौत के कारखानों को बंद कराने की जिम्मेदारी परिवहन विभाग की नहीं थी? बसों में अवैध तरीके से एग्जिट गेट पर लगाई गई सीटें किसी को क्यों नहीं दिखती? राजस्थान में एक नहीं 3000 हजार से ज्यादा ऐसी स्लीपर कोच बस हैं। इनमें फायर सिस्टम जैसी चीज भी नहीं है। इसके बावजूद धड़ल्ले से रजिस्ट्रेशन किया जाता है। भ्रष्ट सिस्टम ही सुरक्षा की लक्ष्मण रेखा लांघने की इजाजत दे रहा है। अग्निपरीक्षा में झुलस रही राजस्थान की जनता राजस्थान में पिछले 10 दिन में ये तीसरा बड़ा हादसा है। सवाल ये है कि भ्रष्टाचार में डूबे सिस्टम के आगे जनता कब तक अग्निपरीक्षा देती रहेगी। जैसलमेर बस कांड के बाद दीपावली पर कई घरों में अंधेरा छा गया है। जोधपुर में एक मां का बेटा-बहू, पोता-पोती नहीं रहे। ऐसे कई उदाहरण हैं, जिन्हें सुनकर कलेजा फट जाए, लेकिन जिम्मेदार के पास रटे-रटाए संवेदनाओं के बोल हैं। ‘हम पीड़ित परिवार के साथ हैं। मृतकों और घायलों के परिवार को आर्थिक सहायता दी जा रही है। हादसे की जांच करवाई जाएगी।’ लेकिन दरअसल कोई सरकार और जनप्रतिनिधि नहीं समझता कि जनता को सिर्फ न्याय चाहिए…बाकी तो सिर्फ छींटे हैं। सच ये है कि परिवहन विभाग की नाक के नीचे रोज हजारों ऐसी मौत की गाड़ियां दौड़ रही हैं। पर्दे के पीछे के वसूली के इस घिनौने सच को बाहर लाकर ठोस कार्रवाई का वक्त आ गया है। हर हादसे के बाद श्रद्धांजलि-मुआवजा देकर भूल जाते हैं सोचिए, यही हादसा किसी और देश में हो जाता तो अब तक सरकार और सिस्टम हिल जाता। लेकिन यहां हर हादसे के बाद जिम्मेदार लोग श्रद्धांजलि देने और मुआवजे की घोषणा करके फिर सब भूल जाते हैं। और फिर एक हादसे का इंतजार शुरू होता है। चीन ने तो स्लीपर बसों पर रोक तक लगा रखी है। क्या हमारे यहां ये इसलिए संभव नहीं है? सच ये है कि सड़कों पर नेताओं और प्रभावशाली लोगों की बसें चलती हैं। ऐसे लोगों में जरा भी नैतिक साहस है तो वे संकल्प लें कि वे ऐसी जानलेवा बसें नहीं चलने देंगे। सरकार को एक लिस्ट जारी करनी चाहिए, जिनकी बसों में ऐसी जानलेवा खामियां हैं। जिन लोगों ने अपनों को खोया है उनका दर्द वे ही जानते हैं। जिम्मेदार पदों पर बैठे हुक्मरानों में जरा भी शर्म और जिम्मेदारी का एहसास बचा है तो तुरंत एक्शन में आएं। हर हादसे को मुआवजे से हल्का करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इंसानी जीवन का कोई मोल नहीं होता है। सभी सरकारें अपने राज्य की तुलना रामराज्य से करती है… क्या परिवहन विभाग बंद नहीं कर देना चाहिए? यह हादसा नहीं, परिवहन विभाग की नाकामी से हुआ नरसंहार है। कब तक हम मासूमों को मरते देखते रहेंगे? सच ये है कि परिवहन विभाग नाकारा हो चुका है। आखिर क्यों नहीं इस विभाग को अब बंद कर देना चाहिए। लाइसेंस देने की कागजी खानापूर्ति करने और सड़कों पर वसूली के अलावा जनता की निगाहों में इस विभाग का कोई काम नहीं रह गया है। परिवहन विभाग की नाक के नीचे रोज हजारों ऐसी मौत की गाड़ियां दौड़ रही हैं। राजस्थान में लगभग 3000 से ज्यादा निजी स्लीपर बसें रोड पर मौत बनकर दौड़ रही हैं। इनमें 100 बसें सरकारी हैं, बाकी निजी। भांकरोटा हादसे के बाद यह दूसरा बड़ा हादसा है, जहां स्लीपर बस में इतनी बड़ी आगजनी हुई। आखिर परिवहन विभाग इन बसों पर रोक के लिए किसका इंतजार कर रहा है। रोडवेज के पास कुल 4500 बसें हैं। क्या आज भी इलाज 275 किमी दूर हादसा जैसलमेर से 9 किलोमीटर दूरी पर होता है। घायलों को 275 किमी दूर जोधपुर रेफर किया जाता है। देश को आजाद हुए 78 साल हो गए, क्या अभी तक हम सीमावर्ती जिलों में ऐसा सिस्टम नहीं बना पाए, जहां आपातकालीन परिस्थिति में मरीज का इलाज हो सकें। और कहां गया हमारा आपदा विभाग जब छोटे-छोटे हादसे में हेलिकॉप्टर उड़ जाते हैं। यहां पर जलते-बिलखते मरीजों को टूटी-फूटी एंबुलेंस में ही क्यों भेजना पड़ा? हमारी सरकारों का ध्यान नए जिले बनाने और कम करने पर ही है। जिले और कम कर दो, लेकिन सुविधाएं तो दो। हर जांच के बाद जिम्मेदारों पर कार्रवाई से क्यों डरता है सरकारी तंत्र पिछले दिनों कई बड़े हादसे हुए, लेकिन जिम्मेदार हर बार बच गए। सभी में जांच कमेटियां बैठी, लेकिन आज तक कुछ नहीं आया। झालावाड़ के सरकारी स्कूल में हादसे में 7 बच्चों की मौत हो गई, इसमें कार्रवाई के नाम पर जिला शिक्षा अधिकारी समेत करीब 10 लोगों को निलंबित किया गया। असल जिम्मेदार बच गए। एसएमएस अस्पताल के आईसीयू में हादसे में अस्पताल अधीक्षक डॉ. सुशील भाटी और ट्रॉमा सेंटर के अधीक्षक डॉ. अनुराग धाकड़ को हटाया। वहीं अधिशासी अभियंता मुकेश सिंघल को सस्पेंड कर दिया। यहां आठ लोगों की मौत हुई थी। ऐसा ही ज्यादातर मामलों में होता है। क्या वास्तव में ये ही जिम्मेदार हैं? किसी मंत्री या सरकार की जवाबदेही नहीं बनती। चलते- चलते डिप्टी सीएम व परिवहन विभाग के मुखिया प्रेमचंद बैरवा का वो बयान… जिसमें उन्होंने कहा था- मेरी औकात से ज्यादा दूंगा… उपमुख्यमंत्रीजी! आप जो भी दें बस, साथ में जनता को ये गारंटी दे दीजिए कि बसों में यात्रा करना सुरक्षित होगा। दूसरा, जिम्मेदारों पर लगातार ऐसी कार्र‌वाई कीजिए कि बिना बस में चढ़े भी आपके नाम से कोई भी समझ जाए कि राजस्थान में यात्रियों की जान खतरे में डालने वाले बख्शे नहीं जाएंगे। …….. हादसे से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… जैसलमेर बस अग्निकांड के बाद 2 अफसर सस्पेंड:नॉन एसी रजिस्टर्ड हुई थी बस, AC में मॉडिफाई करवाई; मौत का आंकड़ा बढ़ा बस में से जलते हुए कूदे यात्रियों का VIDEO:चश्मदीद बोला- झुलसी महिलाएं अपना शरीर बचा रही थीं, आसपास से कपड़े मंगवाकर उन्हें ढंका बस में सीटों पर बैठे-बैठे लोग जलकर कंकाल बने:कुछ के मांस के लोथड़े बचे; एक्सपर्ट बोले- जिंदा जलने से पहले दम घुटा, इसलिए इतनी मौतें