भारतीय रेलवे में पिछले एक दशक के भीतर सुरक्षा के मोर्चे पर बड़ा बदलाव आया है। उदयपुर सांसद मन्नालाल रावत द्वारा संसद में पूछे गए सवाल के जवाब में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पेश किए। रेल दुर्घटनाओं में 10 साल के भीतर 90 फीसदी तक की भारी गिरावट आई है। साल 2014-15 में जहां देशभर में 135 बड़ी रेल दुर्घटनाएं हुई थीं, वहीं साल 2025-26 में 28 फरवरी तक यह संख्या घटकर मात्र 14 रह गई है। यह सुधार रेलवे की कार्यप्रणाली में तकनीक के बढ़ते दखल और रिकॉर्ड निवेश का नतीजा है। सुरक्षा पर 3 गुना बढ़ा खर्च, बदला सिग्नल सिस्टम
रेलवे ने हादसों को रोकने के लिए अपने बजट में ऐतिहासिक बढ़ोतरी की है। साल 2013-14 में सुरक्षा संबंधी कार्यों पर 39,200 करोड़ रुपए खर्च किए जाते थे, जो साल 2026-27 के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार बढ़कर 1,20,389 करोड़ रुपए हो गया है। यानी सुरक्षा पर होने वाला खर्च अब तीन गुना ज्यादा हो रहा है। इस निवेश का बड़ा हिस्सा मानवीय चूक (ह्रुमन एरर) को खत्म करने पर खर्च हुआ है। देश के 6,665 रेलवे स्टेशनों पर अब कांटों और सिग्नलों का संचालन इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम से हो रहा है। साथ ही, राजस्थान सहित देश के 10,153 रेल फाटकों को भी आधुनिक सिग्नल प्रणाली से जोड़कर सुरक्षित बनाया गया है। ‘कवच’ की सुरक्षा और 55 हजार कर्मियों की फौज
ट्रेनों की टक्कर रोकने के लिए भारत ने अपना स्वदेशी ‘कवच 4.0’ सिस्टम विकसित किया है। रेल मंत्री ने बताया कि यह ऑटोमैटिक प्रोटेक्शन सिस्टम अब दिल्ली-मुंबई (जो राजस्थान के कई हिस्सों से गुजरता है) और दिल्ली-हावड़ा जैसे व्यस्त रूटों के 1,452 किलोमीटर हिस्से पर सफलतापूर्वक काम कर रहा है। तकनीक के साथ-साथ रेलवे अपने मैनपावर को भी अपडेट कर रहा है। अब तक 55,000 से ज्यादा रेल कर्मियों को कवच तकनीक का विशेष प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जिनमें करीब 47,500 लोको पायलट और सहायक लोको पायलट शामिल हैं। पुलों की निगरानी और हाईटेक मेंटेनेंस
रेल मंत्री वैष्णव ने जवाब में बताया कि अब रेल पुलों की सुरक्षा के लिए ‘वेब आधारित ऑनलाइन निगरानी प्रणाली’ अपनाई गई है। इससे पुलों की स्थिति का डेटा रियल टाइम में मिलता है और समय रहते मरम्मत कर ली जाती है। पटरियों के रखरखाव के लिए भी अब इंसानी आंखों के बजाय पीक्यूआरएस और टीआरटी जैसी आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल हो रहा है। इसके साथ ही सर्दियों में कोहरे से निपटने के लिए लोको पायलटों को ‘जीपीएस आधारित फॉग सेफ्टी डिवाइस’ दिए जा रहे हैं, जो कम विजिबिलिटी में भी अगले सिग्नल या फाटक की सटीक दूरी बता देते हैं। यात्रियों को जागरूक करने के लिए डिब्बों में फायर सेफ्टी पोस्टर और सख्त नियम भी लागू किए गए हैं।
