राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ की आधिकारिक लिपि को लेकर अंतर होने का दावा किया गया है। राष्ट्रपति सम्मानित नैतिक शिक्षाविद और आध्यात्मिक चिंतक आचार्य सत्यनारायण पाटोदिया ने बताया- भारत सरकार के गृह मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय की वेबसाइटों पर उपलब्ध राष्ट्रगीत की लिपि में शब्दों और लिखने के तरीके में फर्क दिखाई देता है। इस विषय को लेकर उन्होंने केंद्र सरकार के सामने यह मामला रखा है। जयपुर के पिंकसिटी प्रेस क्लब में मीडिया से बात करते हुए आचार्य पाटोदिया ने बताया- राष्ट्रगीत जैसे महत्वपूर्ण विषय में एक जैसी जानकारी होना जरूरी है। सरकारी वेबसाइटों पर अलग-अलग लिपि होने से लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बन सकती है। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ का पाठ भी किया। आचार्य पाटोदिया ने बताया- 7 नवंबर 2025 को ‘वंदे मातरम्’ के 150 साल पूरे होने हैं। ऐसे में इसकी आधिकारिक लिपि में अंतर सामने आना चिंता का विषय है। इस संबंध में उन्होंने संबंधित मंत्रालयों तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की। 15 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली स्थित कर्तव्य भवन जाकर अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास भी किया गया, लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी। डिजिटल माध्यम पर उपलब्ध कराया गया संस्करण आचार्य पाटोदिया ने बताया- मैंने ‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण स्वरबद्ध कर डिजिटल माध्यम पर उपलब्ध कराया है, ताकि लोग इसके सही रूप को समझ सकें। संस्कृति मंत्रालय और गृह मंत्रालय के अधिकारियों से संपर्क किया गया है। अभी तक बातचीत के लिए समय नहीं मिला है। समय मिलने पर वे दोबारा दिल्ली जाकर इस विषय में जानकारी देंगे। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा ‘वंदे मातरम्’ 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया था। बंग-भंग आंदोलन के दौरान यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन में लोगों के बीच जागरूकता और उत्साह का प्रतीक बना। प्रेस वार्ता में उषाश्री, डॉ अमित पटौतिया, बृज किशोर श्रीवास्तव, मुन्ना लाल भाट और डॉ मुरलीधर पटौतिया मौजूद रहे।