बाल मंदिर कॉलोनी में जब ठाकुर मोहन सिंह राजावत की अंतिम यात्रा शुरू हुई, तो वहां मौजूद लोगों की नजरें अचानक ठहर गईं। वजह थी—अर्थी को कंधा देने के लिए आगे बढ़ती उनकी बेटी, बृजेश कंवर। समाज भले ही उसे “बेटी” कहता रहा हो, लेकिन उसके पिता ने उसे हमेशा “बेटा” माना था तो भला अब बेटी कैसे पीछे रहती। अपने पिता की आखरी इच्छा को किया पूरा दरअसल, मोहन सिंह राजावत लंबे समय से ब्रेन कैंसर से जूझ रहे थे। वह अपने अंतिम दिनों में अक्सर कहा करते थे—“मेरी बेटी किसी बेटे से कम नहीं है, और मेरी आखिरी विदाई भी वही करेगी। उनकी इसी इच्छा उनकी बेटी ने पूरा किया। पिता की इस इच्छा को बृजेश कंवर ने अपने साहस और संकल्प से सच कर दिखाया। आंखों में आंसू थे, लेकिन कदमों में हिम्मत। उन्होंने सबसे पहले अपने पिता को पुष्पांजलि दी, फिर खुद कंधा देकर अर्थी को श्मशान तक पहुंचाया। जब मुखाग्नि देने का समय आया, तो माहौल पूरी तरह शांत हो गया। यह सिर्फ एक रस्म नहीं थी—यह सदियों पुरानी परंपराओं को चुनौती देने का क्षण था। और फिर, कांपते हाथों लेकिन मजबूत इरादों के साथ, बृजेश कंवर ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। उस पल वहां मौजूद हर आंख नम थी, लेकिन उन आंसुओं में गर्व साफ झलक रहा था। इस पूरे फैसले में परिवार का साथ सबसे बड़ी ताकत बना। बृजेश ने अपने ससुर और पति भंवर पुष्पेंद्र सिंह से अनुमति मांगी, और उन्होंने न केवल इजाजत दी, बल्कि उसे पूरा समर्थन भी दिया। यही इस कहानी का सबसे प्रेरणादायक पहलू है—जहां रिश्तों ने परंपराओं से ऊपर उठकर इंसानियत और समानता को चुना।

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