नमस्कार ईंधन बचाने की कवायद सीएम ने ईवी कार में चलकर की तो डिप्टी सीएम ने रोडवेज बस में सफर करके। भीलवाड़ा में कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव ने खास ऐलान किया। धौलपुर में लड़की ने शादी की बात ‘हवा’ में कर डाली और राजसमंद में परिवार से बिछड़े बच्चे खिलौना बन गए। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. CM ईवी में, डिप्टी सीएम बस में जोधपुर में सड़कों पर मशीन से पानी के फव्वारे छोड़े जा रहे हैं। ताकि भाप उगलती सड़कों पर चलने वालों को कुछ राहत मिले। लेकिन सड़क पर निकलने से पहले भी हमें बहुत कुछ सोचना है। गर्मी के बारे में नहीं। वह तो पड़ ही रही है। उससे तो बचना ही है। तेल ईंधन का जो वैश्विक संकट छाया हुआ है, उससे लड़ने के लिए अब सड़क पर चलने के बारे में गंभीरता से सोचना होगा। नेतागण ने विचार करना और अमल में लाना शुरू कर दिया है। डिप्टी सीएम साहब ने रोडवेज बस को हाथ का ‘झाला’ देकर रुकवाया और सवार होकर सफर किया। सफर का सफर और बस की व्यवस्थाओं का जायजा भी ले लिया गया। ईंधन का संकट नहीं आता तो महोदय कारों के काफिले में सांय-सांय करते निकल जाते। इसी तरह सीएम साहब कारों के काफिले से दो-तीन कारों पर आ गए हैं और EV कार का इस्तेमाल करने लगे हैं। राज्यपाल महोदय ने काफिले में साथ चलने वाली एंबुलेंस-फायर ब्रिगेड हटा दी। सब अपने-अपने स्तर पर ईंधन बचा रहे हैं। मैसेज बढ़िया है। आज का सादगीपूर्ण आचरण आने वाले कल के लिए जरूरी भी है। अब चाहे ईंधन का संकट हल हो जाए। लेकिन ईंधन बचाने की यह आदत बनी रहनी चाहिए। अगली पीढ़ियों के लिए भी कुछ तो बचाना ही है। 2. राजनीतिक लकीर और मम्मी-पापा की कसम गेलाजी की डूंगरी रोशनी से जगमग थी। भैरूनाथ मंदिर में धार्मिक गीत-संगीत का माहौल था। मंदिर में महायज्ञ का पावन माहौल। कुल मिलाकर आयोजन भीलवाड़ा जिले का है। माताएं-बहनें धार्मिक गीत-संगीत का आनंद ले रही थीं। श्रद्धालुओं का संख्या बल जब चरम पर पहुंच गया, तब मंच के एक छोर से नेताजी उठकर माइक तक आए। नेताजी कांग्रेस नामक दल में राष्ट्रीय सचिव पद पर हैं। भैरूजी की आराधना के इस माहौल में उन्हें बार-बार एक सरपंच महोदय की याद आ रही थी। सरपंच को याद करते हुए नेताजी ने जनता को बताया- जिस सरपंच को दूसरे दल के लोग 5 दिन भी सीट पर चैन से नहीं बैठने देते, उसने मेरी कृपा से 5 साल राज किया। नेताजी ने रहस्य सा खोला- उन्हीं सरपंच ने मेरी पीठ में छुरा घोंपा। नेताजी का तात्पर्य धोखा देने से था। धोखा भी राजनीतिक। इसके बाद उन्होंने उंगली उठाकर आह्वान किया- जो मेरे साथ गद्दारी करे, उसके साथ उठना-बैठना बंद कर दो। उनके पास खड़े रहना बंद कर दो। उनको खाने पर बुलाना बंद कर दो। उनके यहां भोजन पर जाना बंद कर दो। राजनीति में लकीर आपको खींचनी पड़ेगी। मन की बात कहकर नेताजी बैठ गए। इसके बाद धार्मिक कार्यक्रम कंटीन्यू हुआ। भजनों पर एक नृत्यांगना मंच पर नृत्य कर रही थी। राजनीतिक दखल से जनता का जोश कुछ डाउन हो गया था। मंच संचालक ने जोश बढ़ाने के लिए कहा- आपको आपके मम्मी-पापा की कसम अगर भजन पर नहीं नाचे। फिर नृत्य का ज्वार सा उठ गया। नेताजी ने मन ही मन सोचा तो होगा- जनता से बात मनवाने का यह तरीका भी ठीक है। 3. हवा में ‘शादी की बात’ शादी-विवाह के लिए पुराने लोग कहा करते थे- पानी पीना छानकर, बेटी देना जानकर। यानी शादी करने से पहले पूरी पड़ताल की जानी चाहिए। 1975 में एक मशहूर फिल्म में नायक पानी की टंकी पर चढ़कर विवाह का प्रस्ताव रखता है। प्रस्ताव रखने तक तो ठीक। प्रस्ताव ठुकराए जाने पर वह कूद जाने की चेतावनी भी देता है। फिल्म मील का पत्थर साबित हुई और युवाओं को यह विश्वास होने लगा कि शादी-ब्याह की बातें हवा में भी तय की जा सकती हैं। फिल्म के 50 साल बाद भी यह तरीका कारगर है। धौलपुर में एक लड़की ने डॉक्टर युवक से शादी करने की जिद पकड़ ली। जब उसे लगा कि विवाह में किसी प्रकार की अड़चन स्वयं युवक पैदा कर सकता है तो वह शादी की मांग करते हुए गांव में मोबाइल टावर पर चढ़ गई। नीचे पूरा गांव जुट गया। लड़की की एक ही मांग- डॉक्टर से शादी। प्रशासनिक अधिकारी नीचे से गुहार लगाने लगे- आ जाओ बेटा, नीचे उतर आओ। लड़की नहीं मानी। आखिर डॉक्टर साहब को मौके पर बुलाया गया। उनसे कहलवाया गया- मैं तैयार हूं। आ जाओ। नीचे आकर बात करते हैं। लड़की खट-खट करते हुए नीचे उतरने लगी। प्रशासन ने राहत की सांस ली। ऊपरवाले ने जोड़ी बनाई होगी तो दोनों का विवाह अवश्य होगा। खुद ऊपरवाला बनकर जोड़ी बनाने का प्रयास कितना कामयाब होगा, ये पता चल ही जाएगा। 4. चलते-चलते… 15 मई को विश्व परिवार दिवस मनाया गया। हालांकि पहले की तरह अब बड़े परिवार तो रहे नहीं। जहां रहे हैं वे भाग्यशाली हैं। अब परिवार माइक्रो और न्यूक्लियर हो गए हैं। एक शब्द और आ गया। वह है सिंगल पैरेंट। यानी मां या बाप में से एक। वे भी दोनों नहीं। टूटने के किस कगार पर आ गए हैं हम। किसी जमाने में परिवार का मतलब दादा-दादी, ताऊ-ताई, माता पिता, चाचा चाची, बुआ और बहुत सारे चचेरे भाई-बहन हुआ करता था। किसी महानगर के किसी पॉश इलाके में रहने वाले वर्किंग माता-पिता का सिंगल बच्चा जीवन में कुछ पा भी लेगा तो खुशियां किसके साथ शेयर करेगा? विदेशों में कई तरह के शोध किए जा रहे हैं। जिनमें निर्विवाद निष्कर्ष निकल ये निकल रहा है कि परिवार है तो हम हैं। परिवार नहीं तो कुछ नहीं। राजसमंद में एक किसान खेत में पहुंचा। वहां उसे लेपर्ड यानी तेंदुए के दो शावक मिले। बच्चे बहुत छोटे थे। किसान ने एक को गोद में उठा लिया। इसके बाद किसान के बच्चे वहां पहुंच गए। वे भी शावकों के साथ ऐसे खेलने लगे जैसे वे बिल्ली के बच्चे हों। परिवार से भटके बच्चे अक्सर दूसरों के हाथों का खिलौना हो जाते हैं। यह बात लेपर्ड के बच्चों के लिए नहीं है। उन्हें तो अपने झुंड में जाना ही है। इनपुट सहयोग- मनीष जैन (भीलवाड़ा), दिनेश श्रोत्रिय (राजसमंद), नीरज चौधरी (धौलुपर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।