पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहीं दो बालिग युवतियों को राहत देते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने पंजाब पुलिस को निर्देश दिया है कि दोनों के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की पूरी तरह रक्षा की जाए। मामले में दोनों युवतियों ने कोर्ट में याचिका दायर कर बताया कि वे अपनी मर्जी से साथ रह रही हैं, लेकिन परिवार के विरोध के चलते उन्हें जान का खतरा है। उन्होंने पुलिस को शिकायत भी दी थी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। दस्तावेजों की जांच में दोनों बालिग सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों युवतियों द्वारा पेश किए गए आधार कार्ड और अन्य दस्तावेजों की जांच की। रिकॉर्ड देखने के बाद कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि दोनों पूरी तरह बालिग हैं और अपने जीवन से जुड़े फैसले खुद लेने के लिए सक्षम हैं। इस पर अदालत ने स्पष्ट कहा कि किसी भी बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से जीवन जीने और साथी चुनने का पूरा अधिकार है। परिवार या समाज की ओर से इस अधिकार में जबरन हस्तक्षेप करना कानूनन स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह आदेश जस्टिस मंदीप पन्नू की पीठ ने सुनवाई के दौरान पारित किया। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए लुधियाना जिले के खन्ना के एसएसपी को निर्देश दिए कि वे तुरंत इस मामले में दखल दें। अदालत ने कहा कि पुलिस याचिकाकर्ताओं की शिकायत पर तुरंत कार्रवाई करे, उनके बयान दर्ज करे और यह सुनिश्चित करे कि दोनों युवतियों को किसी भी तरह का खतरा न हो। साथ ही पुलिस को यह भी कहा गया कि उनके रहने की जगह और मूवमेंट की सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाए, ताकि उन्हें किसी तरह की धमकी, दबाव या नुकसान का सामना न करना पड़े। आदेश कानूनी मान्यता देने के लिए नहीं अदालत ने अपने आदेश में यह साफ कर दिया कि वह दोनों युवतियों के रिश्ते की वैधता या कानूनी मान्यता पर कोई फैसला नहीं दे रही है। कोर्ट का कहना था कि इस आदेश का उद्देश्य केवल इतना है कि याचिकाकर्ताओं के मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें और उन्हें किसी तरह की धमकी या नुकसान न हो। कोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय संविधान अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। इसमें यह भी शामिल है कि कोई भी बालिग व्यक्ति अपनी पसंद से किसके साथ और कैसे रहना चाहता है। ऐसे निजी फैसलों में जबरन दखल देना संविधान के अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा। सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें यह स्पष्ट किया गया है कि इस तरह के मामलों में सबसे पहले संबंधित व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि अगर समय पर सुरक्षा नहीं दी गई, तो हिंसा, दबाव या उत्पीड़न की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए पुलिस को ऐसे मामलों में तुरंत कदम उठाने चाहिए, ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके।