फैटी लिवर पर पद्मभूषण और पद्मविभूषण से सम्मानित डॉ. डी नागेश्वर रेड्डी ने कहा- नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर आजकल इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि लोग अच्छा खाना नहीं खा रहे और एक्सरसाइज भी नहीं कर रहे। इससे बिना एल्कोहल के भी फैटी लिवर हो सकता है। डॉ. डी नागेश्वर रेड्डी ने कहा-एक रिसर्च में सामने आया है कि हमारे आंतों में बड़ी संख्या में बैक्टीरिया रहते हैं, जिन्हें माइक्रोबायोम कहते हैं। अगर इन बैक्टीरिया में असंतुलन हो जाए तो गैस बनाने वाले जीवाणु बढ़ जाते हैं। नतीजा ज्यादा गैस, एसिडिटी और पेट की समस्या हो जाती है। डॉ. डी नागेश्वर रेड्डी पेट, लिवर और पाचन तंत्र की बीमारियों के विशेषज्ञ हैं। डॉ. रेड्डी को पदमश्री, पद्म भूषण और पद्मविभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। दैनिक भास्कर ने डॉ. रेड्डी से खास बातचीत की। जानिए फैटी लिवर, पेट के कैंसर और स्वस्थ रहने के उपाय। पढ़िए डॉ. डी नागेश्वर रेड्डी का पूरा इंटरव्यू… भास्कर: आजकल गैस, एसिडिटी और पेट खराब होने की समस्या इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है? डॉ. डी नागेश्वर रेड्डी: गैस-एसिडिटी खान-पान की गलत आदतों, एक्सरसाइज की कमी, स्मोकिंग और शराब से हो सकती है। लेकिन सबसे बड़ा कारण अब रिसर्च में सामने आया है कि हमारी आंतों में बैक्टीरिया रहते हैं, जिनको माइक्रोबायोम बोलते हैं। इसमें बदलाव होने पर गैस पैदा करने वाले बैक्टीरिया बढ़ जाते हैं और समस्या गंभीर हो जाती है। भास्कर: माइक्रोबायोम बैक्टीरिया क्या है। और हमारे शरीर को कैसे प्रभावित करता है? डॉ. डी नागेश्वर रेड्डी: माइक्रोबायोम साइंस भी आजकल काफी बढ़ रहा है। भारत का माइक्रोबायोम दूसरे देशों से अलग है। हर देश का अपना माइक्रोबायोम होता है। इसके लिए हमें और रिसर्च करनी पड़ेगी। हमारी बॉडी में 1000 स्पीशीज के बैक्टीरिया रहते हैं। ये बैक्टीरिया सिर्फ पेट नहीं, बल्कि दिल, लिवर और दिमाग को भी कंट्रोल करते हैं। जो लोग डिप्रेशन, हिचकिचाहट या पार्किंसन जैसी बीमारियों से जूझते हैं, उनके पीछे भी ये बैक्टीरिया केमिकल (एंडोर्फिन, डोपामाइन) जिम्मेदार हो सकते हैं। इस पर दुनिया भर में काफी रिसर्च चल रही है। भास्कर: भारत में गैस्ट्रो समस्याएं इतनी ज्यादा क्यों बढ़ रही हैं? डॉ. डी नागेश्वर रेड्डी: इसके दो बड़े कारण हैं, हम जेनेटिकली संवेदनशील हैं। हमारे जीन पैनक्रियास और कैंसर के प्रति पहले से ही संवेदनशील हैं। दूसरा, हाइजीन और खान-पान की आदतें अभी भी पश्चिमी देशों जितनी अच्छी नहीं हैं।
भारत में हेलिकोबैक्टर पाइलोरी बैक्टीरिया का संक्रमण सबसे ज्यादा (करीब 60% लोगों में) है, जो पेट के कैंसर का प्रमुख कारण बनता है। भास्कर: क्या हमारी लाइफस्टाइल पेट की बीमारियों की सबसे बड़ी वजह है? डॉ. डी नागेश्वर रेड्डी: बिल्कुल। हम पश्चिमी खान-पान (अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, फास्ट फूड) अपनाते जा रहे हैं। इससे गैस्ट्रो समस्याएं बढ़ रही हैं। खासकर मेटाबॉलिक एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) यानी फैटी लिवर बहुत तेजी से बढ़ रहा है। ज्यादा तेल-मसालेदार खाना और एक्सरसाइज न करना इसका मुख्य कारण है। इससे डायबिटीज, हार्ट प्रॉब्लम और लिवर कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है। भास्कर: फैटी लिवर क्या है और क्या यह ठीक हो सकता है? डॉ. डी नागेश्वर रेड्डी: पहले हम इसे फैटी लिवर बोलते थे, अभी टर्मिनोलॉजी चेंज हो गई है। अब मेटाबॉलिक एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज बोलते हैं। इसमें लिवर में फैट ज्यादा हो जाता है। सामान्य लिवर में 5% से कम फैट होता है। इससे ज्यादा फैट जमा हो जाए तो समस्या शुरू हो जाती है। अच्छी बात यह है कि यह पूरी तरह ठीक हो सकता है। फैटी लिवर होने की वजह से बॉडी में हार्ट प्रॉब्लम और शुगर प्रॉब्लम होती है। इसको लेकर भारत में बहुत रिसर्च चल रही है। देश में बहुत नए मेडिसिन भी आ गए हैं। जीएलपी1 रिसेप्टर नाम से अभी देश में दवा रिलीज हो गई है। अभी लोकल फार्मेसी कंपनी बहुत कम कीमत पर दवा बना रही हैं। विदेशी कंपनियां भी यहां आकर दवा बना रही हैं। इसका मतलब है कि यह न्यू ड्रग्स इंडिया में डेवलप हो रहे हैं, इसलिए फैटी लीवर डिजीज लोगों में बहुत कॉमन है। स्पेशली अपर मिडिल और मिडिल क्लास में यह कॉमन है। भास्कर: फैटी लिवर से कैसे बचें? डॉ. डी नागेश्वर रेड्डी: दो तरीके से बचा जा सकता है। कंट्रोल डाइट लेना, फैट ज्यादा नहीं लेना, प्रोसेस्ड फूड्स नहीं लेना। जो लोकल डाइट हैं, वो बेस्ट हैं। दूसरा, एक्सरसाइज करना। एक्सरसाइज करने का भी एक तरीका है। जैसे एक वीक में 150 मिनट एक्सरसाइज करें। जैसे एक सप्ताह में आप 5 दिन एक्सरसाइज कर रहे हैं तो हर दिन आधा घंटा एक्सरसाइज करें। ऐसा करेंगे तो फैटी लिवर होने के बहुत कम चांस होंगे। एल्कोहल से भी फैटी लीवर होता है। भास्कर: पेट और आंत के कैंसर के शुरुआती लक्षण क्या हैं? डॉ. डी नागेश्वर रेड्डी: शुरुआत में भूख कम लगना, वजन घटना, पेट में हल्का दर्द या बाउल मूवमेंट में बदलाव जैसे लक्षण दिखते हैं। ये लक्षण छिपे रहते हैं, इसलिए शक होने पर तुरंत एंडोस्कोपी करवाएं। आजकल शुरुआती स्टेज में कैंसर को बिना बड़े ऑपरेशन के एंडोस्कोपी से ही निकाला जा सकता है। भास्कर: किस उम्र के बाद एंडोस्कोपी या कोलोनोस्कोपी करवाना जरूरी है? डॉ. डी नागेश्वर रेड्डी: यह 2 टाइप की होती है। एक अपर एंडोस्कोपी, दूसरा कोलोनोस्कोपी। नॉर्मली अपर एंडोस्कोपी स्क्रीन नहीं करते। कुछ सिंप्टम्स हैं तो जैसे पेट में दर्द हो गया, भूख कम हो तो लोगों की एंडोस्कोपी करते हैं। 45 साल की आयु के बाद कोलोनोस्कोपी करवानी चाहिए, जिससे कैंसर डेवलप हो रहा है तो पकड़ में आ जाए और ट्रीटमेंट किया जा सके।