एक समय जो मोटी ऊन किसानों के लिए बेकार मानी जाती थी। जिस मोटी ऊन को बेकार समझकर किसान फेंक दिया करते थे या फिर औने-पौने दामों में बेच दिया करते थे। वहीं अब फैशन और लाइफस्टाइल प्रोडक्ट्स का हिस्सा बन रही है। भेड़ की मोटी ऊन अब सिर्फ नमदा या सस्ते हस्तशिल्प तक सीमित नहीं रही है। आधुनिक टेक्सटाइल तकनीक ने इसकी तस्वीर बदल दी है। अब इन मोटी ऊन से अब लेडीज पर्स, माउस पैड, ऑफिस फाइल, ब्लेजर, नेहरु जैकेट, रजाई और जैवअपघटित पौध बैग जैसी चीजें तैयार की जा रही है। यह उपलब्धि टोंक के मालपुरा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अधीन केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान (CSWRI), अविकानगर (मालपुरा) के वस्त्र निर्माण एवं वस्त्र रसायन विभाग (TMTC) के वैज्ञानिकों ने करीब एक दशक के अनुसंधान के बाद हासिल की है। ऐसे आया पहली बार आइडिया डॉ. सिको जोस ने बताया- भेड़ के मांस की मांग लगातार बढ़ रही है और इसके साथ ही ऊन का उत्पादन भी दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। हालांकि, अधिकांश ऊन मोटे किस्म की होती है, जिसका अब तक पूर्ण उपयोग नहीं हो पा रहा था। इसके कारण भेड़पालकों को अपनी ऊन का उचित मूल्य भी नहीं मिल पाता था। उन्होंने बताया- इसी स्थिति को देखते हुए मोटी ऊन के बेहतर उपयोग के लिए बुनियादी अनुसंधान की आवश्यकता महसूस हुई। इसके बाद टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग एवं टेक्सटाइल केमिस्ट्री डिवीजन ने मोटी ऊन को मूल्य संवर्धित उत्पादोंं में बदलने के उद्देश्य से पिछले एक दशक में विभिन्न शोध एवं प्रयोग (रिसर्च एक्सपेरिमेंट) शुरू किए। मोटी ऊन की नॉन-बोवन शीट तैयार की करीब दस महीने पहले संस्थान में स्थापित लगभग ढाई करोड़ रुपए की आधुनिक मशीन की मदद से मोटी ऊन की नॉन-बोवन शीट तैयार की गई, जिसके आधार पर कई उपयोगी उत्पाद विकसित किए गए हैं। इनमें से दो उत्पादों की तकनीक महाराष्ट्र की एक निजी फर्म को हस्तांतरित (Technology Transfer) भी की जा चुकी है। इस उपलब्धि से भविष्य में मोटी ऊन की मांग बढ़ने की संभावना है, जिससे भेड़पालकों को उनकी ऊन का बेहतर मूल्य मिल सकेगा। इस अनुसंधान में विभागाध्यक्ष डॉ. अजय कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सिको जोस तथा वैज्ञानिक डॉ. विनोद कदम की अहम भूमिका रही।
डेढ़ दर्जन से अधिक वस्तुएं तैयार करने की तकनीक विकसित तीनों वैज्ञानिकों ने लगातार प्रयोग कर मोटी ऊन को आधुनिक टेक्सटाइल तकनीकों के माध्यम से उपयोगी उत्पादों हैंड बैग, माउस पैड,ऑफिस फाइल बैग, रजाई, कंबल, पौधों के जैव अपघटित बैग, विभिन्न प्रकार के ऊनी उत्पाद सहित डेढ़ दर्जन से अधिक वस्तुएंं तैयार करने की सफल तकनीक विकसित की। कंपोजिट निर्माण तकनीकों का उपयोग डॉ. जोस ने बताया- इन चुनौतियों से निपटने के लिए एक व्यवस्थित रणनीति अपनाई गई। इसके तहत फाइबर संशोधन (Fiber Modification) और कंपोजिट निर्माण तकनीकों का उपयोग किया गया। मोटी ऊन पर नेचुरल रबर लेटैक्स, जैवअपघटनीय (Biodegradable) पॉलीमर और पोलीयूरेथेन की कोटिंग कर उसके लचीलेपन, टिकाऊपन, जल प्रतिरोधक क्षमता तथा सतह के स्पर्श अनुभव में उल्लेखनीय सुधार किया गया। इसके साथ ही कच्चे माल का ग्रेडिंग और प्रसंस्करण की प्रक्रियाओं का मानकीकरण किया गया, ताकि तैयार उत्पादोंं की गुणवत्ता एक समान बनी रहे। साथ ही, डॉ. सिको जोस ने बताया- आईसीएआर केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान (ICAR-CSWRI), अविकानगर में कम कीमत वाली मोटी ऊन से रजाई तैयार की जा रही है। सामान्यतः इस प्रकार की मोटी ऊन कपड़ा निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती, लेकिन संस्थान ने इसे उपयोगी उत्पाद में बदलने की तकनीक विकसित की है। मोटी ऊन से तैयार हो रहे जैवअपघटित पौध बैग डॉ. सिको जोस ने बताया- आईसीएआर-सीएसडब्ल्यूआरआई ने प्लास्टिक नर्सरी बैग के सतत (सस्टेनेबल) विकल्प के रूप में मोटी ऊन से जैवअपघटित (Biodegradable) पौध बैग भी तैयार किए हैं। इन बैगों के निर्माण की प्रक्रिया मोटी ऊन के रेशों की सफाई और उन्हें खोलने से शुरू होती है। इसके बाद निडल-पंच (Needle Punch) तकनीक की सहायता से नॉन-वोवन ऊनी शीट तैयार की जाती है। फिर इस शीट को नर्सरी और बागवानी की आवश्यकता के अनुसार काटकर खुले मुंह वाले बैग के आकार में सिल दिया जाता है। उद्योग को बेची दो उत्पादों की तकनीक संस्थान ने मोटी ऊन से तैयार रजाई और नर्सरी पौध बैग बनाने की तकनीक महाराष्ट्र की एक निजी फर्म को गैर-एकाधिकार लाइसेंस (Non-exclusive License) के माध्यम से हस्तांतरित कर दी है। अब यह फर्म बड़े स्तर पर इन उत्पादोंं का उत्पादन कर बाजार में उतारेगी। इससे मोटी ऊन की मांग बढ़ेगी। मोटी ऊन से तैयार किए जाने वाले उत्पादोंं में आवश्यकता के अनुसार लगभग 20 से 30 प्रतिशत प्राकृतिक रबर लेटैक्स का उपयोग किया जाता है। इससे ऊनी रेशों की मजबूती बढ़ती है और तैयार उत्पाद अधिक टिकाऊ बनते हैं। टेक्सटाइल तकनीकों के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य कर रहा संस्थान के निदेशक डॉ. अरुण कुमार तोमर ने कहा- डॉ. सिको जोस की यह सफलता पूरे संस्थान के लिए गौरव का विषय है। यह संस्थान वस्त्र निर्माण एवं वस्त्र रसायन विभाग पिछले कई वर्षों से ऊन अनुसंधान और आधुनिक टेक्सटाइल तकनीकों के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य कर रहा है। खासकर मोटी ऊन को काफी उपयोगी बना दिया है। मोटी ऊन चुनौती लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय पहचान बनी संस्थान के मीडिया प्रभारी डॉ. अमरसिंह मीना ने बताया- केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान का अंतरराष्ट्रीय पहचान पर उत्कृष्ट प्रदर्शन का लंबा इतिहास रहा है। इससे पहले भी संस्थान के निदेशक डॉ. अरुण कुमार तोमर, डॉ. सिको जोस तथा कई अन्य वैज्ञानिकों को उनके उत्कृष्ट रिसर्च कार्यों के लिए विश्व की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक रैंकिंग में स्थान मिल चुका है। अविकानगर संस्थान केवल राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कृषि एवं ऊन अनुसंधान के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान स्थापित कर चुका है। भेड़ पालकों द्वार मोटी ऊन को व्यर्थ मानकर फेंकते है, यह अब उपयोगी बनती जा रही है। 30 रुपए से 300 रुपए किलो बिकती है ऊन ऊन तीन किस्म की होती है। मोटी, मध्यम और सबसे बारीक। अभी सबसे बारीक (सबसे कम मोटी) ऊन करीब 300 रुपए किलो, मध्यम मोटाई की उन करीब 150 रुपए प्रतिकिलो और सबसे मोटी ऊन 30 से 40 रुपए मिलती है। लागत और बाजार तक पहुंचने का सफर डॉ. सिको जोस ने बताया- मोटे ऊनी रेशों का खुरदरापन, कड़ापन और चुभने वाला स्वभाव इनके उपयोग में सबसे बड़ी बाधा है। यही कारण है कि इनका कपड़ा और अन्य प्रीमियम उपभोक्ता उत्पादों के निर्माण में सीधे तौर पर उपयोग सीमित रहा है। उन्होंने बताया कि प्रसंस्करण के दौरान मोटी ऊन के साथ कई तकनीकी चुनौतियां सामने आती हैं। इनमें रेशों की कम एकजुटता (Cohesion), अत्यधिक रेशों का झड़ना और चिकनी सतह तैयार करने में कठिनाई होती है। इसके अलावा, उपभोक्ता भी मोटी ऊन से बने उत्पादोंं को महीन ऊन के उत्पादोंं की तुलना में कम गुणवत्ता वाला मानते हैं। डॉ. जोस के अनुसार, मोटी ऊन से बने उत्पादोंं के विकास और व्यावसायीकरण में तकनीकी, आर्थिक और बाजार से जुड़ी अनेक चुनौतियां रही हैं। मोटी ऊन के गुणों और उसके उपयोग के फायदों के बारे में लोगों में पर्याप्त जानकारी नहीं होने के कारण भी इसकी मांग सीमित रही। वहीं, कम कीमत वाले सिंथेटिक रेशों और आयातित उत्पादोंं से मिलने वाली प्रतिस्पर्धा भी एक बड़ी चुनौती रही, क्योंकि वे कम लागत में समान स्पर्श का अनुभव प्रदान करते हैं।
