रिहाई के स्पष्ट आदेश जारी होने के बावजूद एक व्यक्ति को 53 दिन तक हिरासत में रखने के मामले में हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को रिहाई का वैध आदेश जारी होने के बाद हिरासत में बनाए रखना संविधान के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट ने नागौर जिले के एक मामले में अवैध हिरासत को लेकर राज्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए पीड़ित परिवार को 2 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने कहा आजादी छीनना प्रशासनिक गलती नहीं, संवैधानिक उल्लंघन है। सिविल कारावास की दी गई थी सजा जस्टिस फरजंद अली व जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ में नागौर जिले के एक व्य​क्ति की ओर से वकील मोतीसिंह राजपुरोहित ने याचिका पेश की थी। सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के आरोप में कार्रवाई करते हुए सिविल कारावास की सजा दी गई थी। इसके खिलाफ अपील पर अतिरिक्त संभागीय आयुक्त, अजमेर ने 15 अप्रैल 2026 को सजा के संचालन को स्थगित कर दिया था और रिहाई का रास्ता साफ किया था। याचिका के अनुसार, आदेश के बावजूद संबंधित अधिकारियों ने उन्हें रिहा नहीं किया और वे करीब 53 दिन तक हिरासत में रहे। आखिर पत्नी ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की, जिसके बाद 8 जून को अदालत के निर्देश पर रिहाई संभव हो सकी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि किसी उच्च प्राधिकारी के आदेश का पालन करना प्रशासनिक विवेक नहीं, बल्कि कानूनी दायित्व है। अदालत ने यह भी माना कि हिरासत शुरू में वैध हो सकती थी, लेकिन सजा स्थगित होने के बाद उसका जारी रहना पूरी तरह अवैध था। कोर्ट ने इस तथ्य को भी गंभीर माना कि संबंधित व्यक्ति एचआईवी से पीड़ित है और उसकी पत्नी कैंसर रोगी है। कोर्ट ने कहा- ऐसे हालात में अवैध हिरासत ने परिवार को अतिरिक्त पीड़ा पहुंचाई। इसी आधार पर कोर्ट ने मुआवजा देकर जवाबदेही तय करने की जरूरत बताई।