विश्व पर्यावरण दिवस पर आज हम आपको पाली का ऑक्सीजन जोन दिखा रहे हैं। यहां एक साल पहले जापानी मियावाकी तकनीक से 30 बीघा जमीन पर 100 से ज्यादा वैरायटी के 1 लाख पौधे लगाए गए थे। दावा किया गया था कि शहर की तुलना में यहां 10 डिग्री तक तापमान कम रहेगा। इसको जानने के लिए हम तापमापी अपने साथ लेकर पहुंचे। सड़क पर शाम करीब 6 बजे तापमान 37 डिग्री दर्ज किया गया, जबकि इसी समय अंदर ऑक्सीजन जोन में 31 डिग्री तापमान रिकॉर्ड हुआ। आगे बढ़े तो यहां कोयल और मोर की आवाज भी सुनाई दी और गर्मी से भी राहत महसूस हुई। पेड़ों के बीच से गुजरते हुए ऐसा लग रहा था मानो किसी घने जंगल के अंदर चल रहे हों। अब पढ़िए, पूरी रिपोर्ट … एक साल पहले लगाए गए थे पौधे फरवरी 2025 में पाली शहर के गिरादड़ा गांव के पास, रोकड़िया हनुमान मंदिर के सामने इस ऑक्सीजन पार्क की शुरुआत की गई। यह जगह शहर से करीब 8-9 किमी दूर है। जिला प्रशासन ने मोहनलाल सायरचंद कवाड़ चेरिटेबल ट्रस्ट के सहयोग से यहां घना जंगल विकसित करने का प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसे ‘ऑक्सीजन पार्क’ नाम दिया गया। 100 से ज्यादा वैरायटी के 1 लाख पौधे लगाए गए इस प्रोजेक्ट के पहले चरण में 30 बीघा जमीन पर करीब 1 लाख पौधे लगाए गए। यहां 100 से ज्यादा वैरायटियों के पौधे लगाए गए हैं, जिनमें फलदार, फूलदार और औषधीय पौधे भी हैं। सभी पौधे करीब 2–2 फीट की दूरी पर लगाए गए। इस पूरे प्रोजेक्ट का उद्घाटन 2 फरवरी 2025 को किया गया। बाद में मई 2025 में पास की गोचर भूमि में भी 32 हजार पौधे लगाए गए। सिंचाई के लिए 2.26 लाख लीटर क्षमता का टैंक मोहनलाल सायरचंद कवाड़ चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी शांतिलाल कवाड़ के अनुसार, पौधों की सिंचाई के लिए यहां 2.26 लाख लीटर क्षमता का टैंक बनाया गया है। पौधों को स्प्रिंकलर सिस्टम से पानी दिया जाता है। साथ ही जड़ों में नमी बनी रहे, इसके लिए विशेष घोड़ा घास भी बिछाई गई है। लोगों के घूमने के लिए बन रहा ट्रैक ट्रस्टी शांतिलाल कवाड़ ने बताया – आने वाले 3 साल में ये पौधे 40 फीट तक ऊंचे पेड़ बन जाएंगे। इसके बाद यह पूरा क्षेत्र घने जंगल में बदल जाएगा, जहां आसपास के इलाकों की तुलना में ज्यादा ऑक्सीजन मिलेगी। मियावाकी तकनीक से तैयार हो रहा जंगल पूरा जंगल जापान की डॉ. अकीरा मियावाकी पद्धति से तैयार किया जा रहा है। इसकी देखरेख फॉरेस्ट क्रिएटर्स नाम की संस्था कर रही है, जिसे 3 साल की जिम्मेदारी दी गई है। इस तकनीक से लगाए गए पौधों की एक साल में ऊंचाई 10-12 फीट तक पहुंच चुकी है। इसके लिए ट्रस्ट ने करीब 4 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। पौधों को नुकसान से बचाने और सिंचाई के लिए ड्रेनेज सिस्टम इस प्रोजेक्ट से जुड़े अशोक गादिया बताते हैं कि तेज आंधी में पौधों को नुकसान न हो, इसके लिए इन्हें बांस से सहारा दिया गया है। बारिश का पानी जमा न हो, इसके लिए ड्रेनेज सिस्टम बनाया गया है, जिससे पानी बहकर सीधे बनाए गए टैंक में स्टोर हो जाता है। ऑक्सीजन जोन में लगाए ये पौधे
करंज, अर्जुन, शीशम, सतपर्णी, महोगिनी, साग, कदंब, सरु, चिलबिल, बिल्वपत्र, बांस, नीम, कसीड, बंगाली बबर, अबर, व्हाइट सिरस, मालबार नीम, कजोलिया, बहड़, महोवा, चील, बिलायती कीकर, तुलसी, लेमन ग्रास, ब्लैक जामुन, देसी बेर, जैक फ्रूट, आम, खट्टी इमली, लेमन, करोंदा, आंवला, अनार, पेरू, गुढल, कनीर, चांदनी समेत कई वैरायटी के पौधे लगाए गए हैं।
