भीलवाड़ा में निर्जला एकादशी के अवसर पर प्राचीन ग्यारस माता मंदिर में रविवार को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। महिलाओं ने पूरे दिन निर्जल रहकर व्रत किया और फल, नारियल व जल से भरे मिट्टी के कलश अर्पित कर ग्यारस माता की पूजा-अर्चना की। मंदिर परिसर में कलश स्थापना, दान-पुण्य, धार्मिक अनुष्ठान और ठंडाई वितरण के कार्यक्रम आयोजित किए गए। वहीं शहर के कई स्थानों पर श्रद्धालुओं और सामाजिक संगठनों की ओर से शर्बत की स्टॉल भी लगाई गईं। मंदिर पुजारी दीपक पराशर ने बताया कि निर्जला एकादशी वर्ष में एक बार आने वाली विशेष एकादशी है, जिसे 24 एकादशियों के समान माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन विधि-विधान से व्रत रखने पर पूरे वर्ष की एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता है। उन्होंने बताया कि महिलाएं निर्जल रहकर व्रत करती हैं और फल, नारियल तथा जल से भरे मिट्टी के कलश माता को अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। सुख-शांति और मोक्ष की कामना से रखा जाता है व्रत पुजारी के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत करने से 12 महीनों की एकादशियों का फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि इससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है तथा मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। उन्होंने बताया कि भीलवाड़ा स्थित ग्यारस माता मंदिर अत्यंत प्राचीन है, जहां जयपुर, दूदू, जोधपुर, बाड़ा, कोटा, किशनगढ़, अजमेर, उदयपुर सहित राजस्थान के विभिन्न जिलों से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में हुए दान-पुण्य और सेवा कार्य निर्जला एकादशी के अवसर पर मंदिर परिसर में कलश स्थापना के साथ दान-पुण्य के कार्य किए गए। श्रद्धालुओं के लिए ठंडाई वितरण की व्यवस्था की गई, जबकि शहर के विभिन्न क्षेत्रों में शर्बत की स्टॉल लगाकर राहगीरों को गर्मी से राहत पहुंचाने का प्रयास किया गया। महिलाओं ने बताया व्रत का महत्व श्रद्धालु एकता पाराशर और शकुंतला देवी ने बताया कि निर्जला एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि इस दिन किए गए व्रत और पूजा से पूरे वर्ष की 24 ग्यारस का पुण्य फल प्राप्त होता है। महिलाओं ने कहा कि वे परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना के साथ निर्जल रहकर ग्यारस माता की उपासना करती हैं और धार्मिक कथाओं का श्रवण करती हैं।
