एक मां अपने बच्चे के दर्द को सबसे करीब से महसूस करती है। पाली जिले के मारवाड़ जंक्शन क्षेत्र के हेमलियावास खुर्द निवासी साइकोलॉजिस्ट नेहा सोलंकी ने भी अपने बेटे की तकलीफ को अपनी ताकत बना लिया। सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित बेटे के लिए उन्होंने ऐसी विशेष कुर्सी तैयार की, जिस पर दिव्यांग बच्चे बिना किसी सहारे के सुरक्षित और आरामदायक तरीके से बैठ सकें। उनके इस इनोवेशन ने उनके बेटे की जिंदगी आसान बनाई, साथ ही देशभर के विशेष बच्चों के लिए उम्मीद भी बनी हैं। अब नेहा सोलंकी का नीति आयोग के अटल इनोवेशन मिशन ने वर्ष 2026 के ‘ग्रासरूट्स इनोवेटर रिकग्निशन’ के लिए उनका चयन किया है। पूरे देश से चुने गए 26 इनोवेटर शख्सियतों में उन्हें स्थान मिला है। उन्हें 31 जुलाई 2026 को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सम्मानित करेंगी। बेटे की बीमारी बनी प्रेरणा
जयपुर निवासी नेहा सोलंकी की करीब 15 साल पहले पाली जिले के हेमलियावास खुर्द निवासी डॉ. अभिषेक भाटी से शादी हुई। शादी के बाद बेटे के जन्म से परिवार में खुशियां आईं, लेकिन 6 महीने बाद पता चला कि उनका बेटा सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित है। नेहा बताती हैं कि इस बीमारी में मस्तिष्क का विकास होता है, लेकिन शरीर की गतिविधियों पर पूरा नियंत्रण नहीं रह पाता। बच्चे को बैठने, उठने और संतुलन बनाए रखने में काफी कठिनाई होती है। बेटे की परेशानी ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया और यहीं से दिव्यांग बच्चों के लिए कुछ करने का संकल्प जन्मा। स्कूलों के इनकार के बाद इनोवेशन करने का फैसला लिया
वर्तमान में जोधपुर में रह रही नेहा बताती हैं कि वर्ष 2023 में बेटे के स्कूल में प्रवेश के लिए कई निजी स्कूलों के चक्कर लगाए, लेकिन अधिकांश स्कूलों ने उसकी शारीरिक स्थिति का हवाला देते हुए प्रवेश देने से मना कर दिया। आखिरकार एक स्कूल ने शर्त रखी कि यदि बच्चा सुरक्षित तरीके से बैठ सके तो प्रवेश दिया जाएगा। इसी चुनौती ने नेहा को विशेष कुर्सी बनाने की प्रेरणा दी। 9 महीने की मेहनत से तैयार हुई स्पेशल कुर्सी
नेहा ने करीब 9 महीने के रिसर्च और मेहनत के बाद ऐसी विशेष कुर्सी तैयार की, जिस पर सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित बच्चा बिना किसी सहारे के सुरक्षित बैठ सकता है। इस कुर्सी में बच्चे के शरीर को जरूरी सपोर्ट मिलता है, जिससे गिरने का खतरा भी नहीं रहता। इसी कारण उनका 10 वर्षीय बेटा सामान्य बच्चों के साथ स्कूल में पढ़ाई कर रहा है। यह कुर्सी 3 से 12 साल तक के बच्चों के लिए उपयोगी है और इसका पेटेंट भी भारत सरकार से प्राप्त हो चुका है। दिव्यांग बच्चों के लिए बनाई कंपनी
अपने बेटे के अनुभव के बाद नेहा ने एक कंपनी की स्थापना की, जो विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए सहायक उपकरण विकसित करती है। अब तक वे दो प्रकार की विशेष कुर्सियां विकसित कर चुकी हैं। इसके अलावा ऐसे कई अन्य उपकरणों पर भी काम चल रहा है, जिनकी मदद से दिव्यांग बच्चे रोजमर्रा के कार्य अधिक आत्मनिर्भर होकर कर सकें। नेहा के पति एनजीओ चलाते है, जिसके जरिए नशा मुक्ति केंद्र का भी संचालन किया जाता है।

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