पौराणिक कथाओं को समकालीन सामाजिक सरोकारों से जोड़ते हुए ‘समुद्र मंथन’ नाटक की प्रस्तुति रविवार को महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी, जयपुर के आर.एल. स्वर्णकार ऑडिटोरियम में हुई। यह प्रस्तुति रामजी लाल स्वर्णकार के 23वें पुण्य स्मृति समारोह के तहत आयोजित की गई। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की रेपर्टरी कंपनी की इस विशेष प्रस्तुति का निर्देशन एनएसडी के निदेशक और वरिष्ठ रंगकर्मी चितरंजन त्रिपाठी ने किया, जबकि नाटक के लेखक आसिफ अली हैं। ‘समुद्र मंथन’ में पौराणिक कथा के माध्यम से आधुनिक समाज के सामने खड़े सवालों को उठाया गया। नाटक का केंद्रीय विचार यह है कि जिस तरह पौराणिक समुद्र मंथन से अमृत के साथ हलाहल विष भी निकला था, उसी तरह आज विकास, विज्ञान, तकनीक और समृद्धि के मंथन से उपलब्धियों के साथ प्रदूषण, असंतुलन, तनाव और पर्यावरणीय संकट भी सामने आ रहे हैं। यहां देखिए नाटक के फोटोज…
अमृत की तलाश में निकला विष बना आज का सवाल नाटक की मूल कथा समुद्र मंथन की पौराणिक अवधारणा पर आधारित है। देवताओं और असुरों ने अमृत की तलाश में क्षीर सागर का मंथन किया। मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाया गया। सभी की नजर अमृत पर थी, लेकिन मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला। इसके प्रभाव से सृष्टि पर संकट मंडराने लगा और भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर सृष्टि को विनाश से बचाया। नाटक इसी कथा को वर्तमान समय के संदर्भ में आगे बढ़ाता है। प्रस्तुति में सवाल उठाया गया कि आज विकास और तकनीक के मंथन से मिलने वाले लाभों के साथ जो ‘विष’ निकल रहा है, उसे कौन धारण करेगा? प्रदूषण, प्लास्टिक, रासायनिक खतरे और पर्यावरणीय असंतुलन जैसे संकटों की जिम्मेदारी किसकी है? पौराणिकता के साथ आधुनिकता का मेल नाटक की खासियत रही कि इसमें पौराणिक कथा को उसके मूल भाव के साथ रखते हुए आधुनिक समय की समस्याओं को जोड़ा गया। मंच पर देव और असुर केवल पौराणिक पात्रों के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर मौजूद सकारात्मक और नकारात्मक प्रवृत्तियों के प्रतीक के रूप में भी सामने आते हैं। प्रस्तुति यह सवाल भी दर्शकों के सामने रखती है कि क्या मनुष्य अपने भीतर के देवत्व और आसुरी प्रवृत्तियों को पहचान पा रहा है? इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं, कमजोरियों और संवेदनाओं से भरे मनुष्य के भीतर भी लगातार एक तरह का ‘मंथन’ चलता रहता है। 100 से अधिक कलाकारों ने रचा मंचीय वैभव नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की इस प्रस्तुति में 100 से अधिक कलाकारों ने हिस्सा लिया। भव्य मंच सज्जा, दृश्य वैभव, संगीत, नृत्य और आधुनिक रंग-तकनीक के माध्यम से समुद्र मंथन की कथा को मंच पर जीवंत किया गया। नाटक में पौराणिक प्रसंगों को आधुनिक रंग-तकनीक और दृश्यात्मक प्रभावों के साथ प्रस्तुत किया गया, जिससे दर्शकों को एक साथ सांस्कृतिक और समकालीन अनुभव मिला। संगीत और नृत्य ने कथा के भावनात्मक पक्ष को मजबूती दी, वहीं मंच सज्जा ने समुद्र मंथन के विशाल कैनवास को दर्शाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नाटक का संदेश आज के संदर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक दिखाई देता है। आधुनिक विकास ने जीवन को सुविधाजनक बनाने के साथ अनेक उपलब्धियां दी हैं, लेकिन इसके साथ पर्यावरण प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा और रासायनिक खतरों जैसी चुनौतियां भी सामने आई हैं। प्रस्तुति दर्शकों को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि विकास की दौड़ में हम उसके दुष्परिणामों पर कितना विचार कर रहे हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण को सुरक्षित रखना किसकी जिम्मेदारी है और विकास तथा प्रकृति के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए? नाटक इन सवालों को सीधे दर्शकों के सामने रखता है।