स्कूल में पढ़ते समय दोस्त के घर गया तो वहां अनार का बगीचा देखा। तब पता चला कि पौधे खारे पानी में भी पनप जाते हैं। बागवानी का मन बनाया, लेकिन ज्यादा खारा पानी बड़ी अड़चन थी। काजरी (केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान), जोधपुर में टेस्ट कराने पर मिट्टी-पानी को सही नहीं बताया। लोगों ने कहा- इस एरिया में अनार लगाने की सोच रहे हैं, ऐसा करने वालों को जल्दी ही जमीन बेचनी पड़ेगी। काफी सर्च के बाद आसपास के पांच किसानों को राजी किया। महाराष्ट्र के नासिक में किसानों के खेतों में पहुंचकर बागवानी की बारीकियां सीखीं। वहीं से अनार के 2000 पौधे मंगवाए। 12 बीघा जमीन पर शुरुआत की। दो साल बाद 9 लाख रुपए की इनकम हुई। अनार को मौसमी बीमारी से बचाने के लिए खेत में ही एक्सपेरिमेंट किया और हार्वेस्टिंग का पैटर्न ही बदल दिया। बगीचा 50 बीघा में बढ़ने के साथ ही सालाना आय भी 50 लाख रुपए तक हो गई है। जहां लोग बागवानी से कतराते थे, अब जिला अनार के प्रोडक्शन का हब बन गया है। म्हारे देश की खेती में इस बार बात जालोर के युवा किसान की… सायला क्षेत्र के मानाराम चौधरी (32) किसान परिवार से हैं। उनके पिता पदमाराम चौधरी भी खेती करते थे। बड़े भाई चैनाराम (40) और जोइताराम (35) का मैसूर (कर्नाटक) में बुक स्टोर है। छोटे भाई प्रकाश (27) ने एग्रीकल्चर में बीएससी की है। नौकरी नहीं मिलने पर उन्होंने तमिलनाडु में हार्डवेयर का काम शुरू कर दिया। मानाराम ने 2016 में जीएनएम की पढ़ाई पूरी की। 2018 में पोस्ट बेसिक बीएससी नर्सिंग की और सरकारी नौकरी की तैयारी करते रहे। 2023 में नर्सिंग ऑफिसर ग्रेड-2 भर्ती में उनका सिलेक्शन भी हो गया, लेकिन बोनस अंक के विवाद के कारण भर्ती कोर्ट में अटक गई। एम्स में नर्सिंग की नौकरी के लिए भी प्रयास किया। 2020 में पिता का निधन हो गया। उस समय मानाराम जोधपुर में रहकर नर्सिंग की पढ़ाई कर रहे थे। दोस्त के अनार का बगीचा देख आया आइडिया मानाराम ने बताया- जोधपुर में 12वीं की पढ़ाई के दौरान दोस्त के घर गया, जहां पहली बार अनार का बगीचा देखा। वे खारे पानी में भी अनार उगा रहे थे। हमारे भी खारे पानी की समस्या थी, इसलिए सोचा कि अपने खेत में भी इसका प्रयोग किया जा सकता है। जांच में जमीन-पानी सही नहीं बताया, फिर भी नासिक पहुंचे मानाराम ने बताया- साल 2012 में बागवानी शुरू करने से पहले मिट्टी और पानी के सैंपल की जोधपुर के काजरी में जांच करवाई। वहां जमीन को बंजर और पानी को अनार की खेती के लिए अनुपयुक्त बताया गया। गांव में लोगों ने भी कहा कि जो फसल यहां हो नहीं सकती, उसके पीछे क्यों पड़ रहे हो। नुकसान हुआ तो जमीन बेचकर कर्जा चुकाना पड़ेगा। इसके बावजूद पांच किसानों का ग्रुप बनाया। नासिक (महाराष्ट्र) जाकर अनार की बागवानी का तरीका समझा। वहां काली मिट्टी और मीठा पानी था, जबकि सायला की परिस्थितियां अलग थीं। 12 बीघा में लगाया पहला बगीचा मानाराम ने बताया- नासिक से सिंदूरी भगवा वैरायटी के 2000 पौधे मंगवाए। एक पौधा करीब 40 रुपए का था। शुरुआत में 12 बीघा में पौधे लगाए। इनके बीच 9 बाई 11 फीट की दूरी रखी। दो फीट चौड़े और तीन फीट गहरे गड्ढे खोदकर सात दिन तक खुले छोड़े। हर गड्ढे में करीब 10 किलो गोबर डाला। प्रति पौधा 200 ग्राम डीएपी, 50 ग्राम एमओपी व 20 ग्राम माइक्रो न्यूट्रिएंट मिलाकर पौधा लगाया। सिंचाई के लिए करीब 2 लाख रुपए का ड्रिप सिस्टम लगाया, जिसमें सब्सिडी के बाद 60 हजार रुपए जमा कराने पड़े। खेती शुरू करने के लिए बैंक से डेढ़ लाख रुपए का लोन लिया। भाइयों ने भी सहयोग किया। प्रॉफिट बढ़ाने के लिए बदल दिया पैटर्न मानाराम ने बताया कि 2014 में पौधे लगाने के दूसरे साल फल आने लगे। पहली फसल में 2000 पौधों से करीब 9.50 लाख रुपए की आय हुई। उस समय स्थानीय बाजार नहीं था, इसलिए महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, जयपुर और कर्नाटक से कम व्यापारी अनार खरीदने आते थे। अब सायला के जीवाणा क्षेत्र में करीब 20 मंडियां हैं। 50 से 80 रुपए किलो तक भाव मिल जाता है। पांच साल के पौधे से 25 से 30 किलो और 10 साल के पौधे से करीब 45 किलो तक अनार मिलता है। पौधे बढ़ने के साथ बीमारी की समस्या भी बढ़ी। सामान्य तौर पर दिसंबर से फरवरी तक तुड़ाई होती है। सर्दी में फंगस व फफूंद की समस्या ज्यादा रहती है। करीब तीन साल पहले 800 पौधों पर ट्रायल किया। जनवरी में स्प्रे किया और जुलाई-अगस्त में तुड़ाई शुरू कर दी। इससे बीमारी का खर्च कम हुआ और फायदा अच्छा मिला। इसके बाद पूरे बगीचे का पैटर्न बदल दिया। सर्दी शुरू होने से पहले हार्वेस्टिंग पूरी करने लगे। अनार के साथ इंटरक्रॉपिंग नहीं हो पाने के कारण नए बगीचों में पौधों के बीच की दूरी भी बढ़ा दी। अब 50 बीघा में अनार के 5500 पौधे किसान मानाराम ने बताया- अब करीब 50 बीघा में अनार का बाग है। अनार के 5500 पौधों से सालाना करीब 45 से 50 लाख रुपए की कमाई हो रही है। इसी मार्च में तीन बीघा में मोरिंगा के 1000 पौधे लगाए हैं। करीब दो महीने बाद इसकी हार्वेस्टिंग शुरू होने की उम्मीद है। मोरिंगा भी खारे पानी में पनप जाता है। यह आयुर्वेदिक पौधा है। बाग में नियमित रूप से पांच लोग काम करते हैं। इन्हें पार्टनरशिप पैटर्न पर रखा है। बागवानी पर सालभर में करीब 10 लाख रुपए खर्च हो जाता है। बागवानी देखने हॉर्टिकल्चर एसीएस भी दौरे पर पहुंचे थे। उन्होंने इतने खारे पानी में अनार की खेती होने पर हैरानी जताई। जिस जमीन और पानी को अनार की खेती के लिए अनुपयुक्त बताया गया था, उसी में लगातार प्रयोग, सीख और तरीके में बदलाव से आज बगीचा खड़ा किया है। … खेती-किसानी से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… देश के सबसे बड़े खजूर-फार्म से मिला बागवानी का आइडिया:सब्सिडी पर पौधे नहीं मिले तो ज्यादा रेट पर खरीदे; नौकरी की तैयारी के साथ लगाया बाग पिता सरकारी टीचर हैं। उनकी पहली पोस्टिंग जैसलमेर में हुई थी। वहां सरकार ने देश का सबसे बड़ा खजूर फार्म बनाया था। यहीं पहली बार फ्रेश खजूर खाया। पूरी खबर पढ़िए
