कोटा की बॉक्सर अरुंधति चौधरी कॉमनवेल्थ गेम्स मुकाबले के फाइनल में पहुंच गई हैं। अरुंधति ने शुक्रवार को 70 किलोग्राम भार वर्ग में वेल्स (यूके) की बॉक्सर रोसी एकेल्स को हराकर सिल्वर मेडल पक्का कर लिया है। रोसी एकेल्स पिछले कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 की गोल्ड मेडलिस्ट थीं। अरुंधती कल गोल्ड के लिए इंग्लैंड की खिलाड़ी से भिड़ेंगी। राष्ट्रमंडल खेल (Commonwealth Games) स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में हो रहे हैं। 23 जुलाई से 2 अगस्त तक आयोजित होंगे। फाइनल में पहुंचने वाली अरुंधती के पिता सुरेश चौधरी प्रॉपर्टी का काम करते हैं। बड़ा भाई बीबीए की पढ़ाई के बाद पिता के काम में हाथ बंटाता है। अरुंधति की बड़ी बहन डॉक्टर है। अरुंधति सबसे छोटी हैं। पिता का अब केवल एक ही सपना है कि बेटी ओलंपिक में स्वर्ण पदक हासिल कर देश का नाम दुनिया में रोशन करे। बेटी की उपलब्धि पर पिता सुरेश चौधरी ने खुशी जताई। उन्होंने अरुंधति के बचपन से लेकर इंटरनेशनल बॉक्सर बनने तक के संघर्ष, चोटों और पारिवारिक चुनौतियों की कहानी भास्कर के साथ साझा की है। पढ़ें अरुंधति के संघर्ष की कहानी… बास्केटबॉल की कप्तान से मुक्केबाजी की रिंग तक पिता सुरेश चौधरी ने बताया- अरुंधति बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थी। स्पोर्ट्स में बेहद रुचि रखती थी। अरुंधति स्प्रिंग डेल स्कूल में छठवीं क्लास में पढ़ती थी। उस समय बास्केटबॉल टीम की कैप्टन थी। उनकी कप्तानी में स्कूल की टीम ने जिला और राज्य स्तरीय स्कूली गेम्स में टीम ने हिस्सा लिया। जब उसने व्यक्तिगत खेल चुनने की इच्छा जताई, मेरी सलाह पर उसने बॉक्सिंग को चुना। मुझसे कहा- बॉक्सिंग का कोच ला दो। उस समय कोटा में बॉक्सिंग का कोई माहौल या कोच नहीं था। नहीं मिला कोच, यू-ट्यूब बना सहारा कोटा, जयपुर और भोपाल तक कोच की तलाश करने के बाद भी जब कोई बॉक्सिंग कोच नहीं मिला, तो स्थानीय ताइक्वांडो कोच अशोक गौतम से संपर्क किया। कोच साहब ने भी हार नहीं मानी और यू-ट्यूब पर बॉक्सिंग की तकनीकें देख-देखकर अरुंधति को ट्रेनिंग देना शुरू किया। 2017 में रोहतक में हुए पहले नेशनल टूर्नामेंट में अरुंधति ने हरियाणा की कड़क बॉक्सर को पहले ही राउंड में नॉकआउट कर दिया, जिसके बाद भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) ने उसे यूक्रेन ट्रेनिंग के लिए चुना।
पिता बोले- अरुंधति ने हार नहीं मानी पिता सुरेश ने बताया- रिंग में बॉक्सिंग के दौरान अरुंधति की दोनों कलाइयों में गंभीर चोट आई, जिसके बाद दोनों हाथों में प्लेट्स लगवानी पड़ी और एड़ी में भी फ्रैक्चर हो गया था। पेरिस ओलंपिक क्वालीफायर के दौरान अरुंधति की मां आईसीयू में थीं। मां की चिंता और मानसिक तनाव के बीच अरुंधति ने मैच खेला। पिता बताते हैं कि पिछले तीन सालों से अरुंधति की मां बेडरेस्ट पर हैं और स्पोर्ट्स पॉलिटिक्स के कारण भी अरुंधति के करियर में कुछ साल रुकावट आई, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी। मैं देश के लिए ओलंपिक गोल्ड जीतने वाली पहली लड़की बनूंगी बेटी के आत्मविश्वास का एक किस्सा साझा करते हुए सुरेश चौधरी ने बताया कि जब वह 15 साल की थी, तब मैंने उससे कहा था कि तू पढ़ाई में अच्छी है, IIT या IAS की तैयारी कर। तब उसने मुझसे पूछा- पापा हर साल कितने IITian और IAS बनते हैं? तो मैंने कहा- हजारों IITian और सैकड़ों IAS बनते हैं। फिर उसने पूछा कि भारत के पास ओलंपिक में व्यक्तिगत गोल्ड कितने हैं? तब मैंने कहा एक। तब उसने मेरी आंखों में आंखें डालकर कहा- आपकी बेटी भारत के लिए ओलंपिक में गोल्ड जीतने वाली पहली लड़की बनेगी।