राजस्थान में प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर विरोध तेज होता जा रहा है। इसी कड़ी में शुक्रवार को मुस्लिम समाज ने मोती डूंगरी रोड स्थित मुसाफिर खाने में बड़ी धार्मिक सभा का आयोजन किया। सभा में बड़ी संख्या में महिला-पुरुष शामिल हुए। इस दौरान राज्य सरकार से राजस्थान में समान नागरिक संहिता लागू नहीं करने की मांग की गई। सभा में सामाजिक, धार्मिक और मानवाधिकार संगठनों के साझा मंच ने प्रस्तावित कानून को लेकर अपनी आपत्तियां रखीं। मंच ने सरकार से UCC के प्रस्ताव पर विस्तृत श्वेतपत्र जारी करने और कानून बनाने से पहले संबंधित समुदायों, महिला संगठनों, विधि विशेषज्ञों, धार्मिक विद्वानों और सिविल सोसाइटी से व्यापक परामर्श करने की मांग की। विरोध में मुस्लिम समाज के लोगों ने विधानसभा कूच भी किया, हालांकि पुलिस ने उन्हें एमडी रोड पर ही समझाइश के बाद राज्यपाल के नाम ज्ञापन लिया। सात दशक से चर्चा में UCC मंच से वक्ताओं ने कहा कि भारत में समान नागरिक संहिता का मुद्दा पिछले 7 दशकों से संविधान सभा की बहसों से लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, चुनावी घोषणापत्रों और विधानसभाओं तक चर्चा का विषय रहा है। उत्तराखंड ने वर्ष 2024 में राज्य स्तर पर UCC लागू किया। इसके बाद गुजरात, असम, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित कुछ राज्यों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं। राजस्थान सरकार ने राज्य स्तरीय UCC का मसौदा तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं। धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का मुद्दा सभा में वक्ताओं ने कहा कि UCC केवल कानूनी सुधार का विषय नहीं है, बल्कि इसका संबंध धर्म, संस्कृति, पहचान, महिला अधिकार, आदिवासी परंपराओं और संघीय ढांचे से भी है। राजस्थान जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक राज्य में किसी समान कानून के अलग-अलग समुदायों पर पड़ने वाले प्रभावों का गंभीरता से अध्ययन किया जाना चाहिए। मंच ने संविधान के अनुच्छेद 44 का हवाला देते हुए कहा कि राज्य को समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। वहीं, अनुच्छेद 25 और 26 नागरिकों तथा धार्मिक समुदायों को धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार प्रदान करते हैं। मंच के अनुसार, अनुच्छेद 44 नीति-निर्देशक तत्वों का हिस्सा है और अनुच्छेद 37 के तहत नीति-निर्देशक तत्व शासन के लिए मार्गदर्शक हैं। ऐसे में इनका क्रियान्वयन मौलिक अधिकारों को प्रभावित करने की कीमत पर नहीं किया जाना चाहिए। बहुसांस्कृतिक स्वरूप प्रभावित होने की आशंका साझा मंच ने आशंका जताई कि यदि UCC के जरिए विभिन्न समुदायों को उनकी मौजूदा धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से अलग किसी वैधानिक व्यवस्था का पालन करने के लिए बाध्य किया जाता है, तो इससे संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19, 21, 25, 26 और 29 के तहत प्राप्त अधिकारों को लेकर गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े हो सकते हैं। मंच का कहना है कि अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद विविधता भारत की बहुलतावादी सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना का हिस्सा है। इसलिए व्यक्तिगत कानूनों में किसी भी बदलाव से पहले संबंधित समुदायों और विशेषज्ञों के साथ व्यापक संवाद जरूरी है। मंच की चार प्रमुख मांगें सरकार से UCC लागू नहीं करने का आह्वान साझा मंच ने प्रदेश के सामाजिक, धार्मिक और मानवाधिकार संगठनों से इस मुद्दे पर एकजुट होने का आह्वान किया। मंच ने कहा कि उसका उद्देश्य किसी एक समुदाय का विरोध करना नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र, धार्मिक स्वतंत्रता और देश की बहुलतावादी विरासत की रक्षा करना है। सभा के दौरान राजस्थान सरकार से मांग की गई कि UCC लागू करने से पहले इसके संवैधानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों पर व्यापक सार्वजनिक विमर्श कराया जाए और राजस्थान में समान नागरिक संहिता लागू नहीं की जाए।