नमस्कार जयपुर में पूर्व मुख्यमंत्रीजी को सफर में गुलाबी थैला दिखा तो पुरानी यादें ताजा हो गईं। जोधपुर में बोतल छाप पार्टी के मुखियाजी की प्यारी घड़ी गुम हो गई। सवाई माधोपुर की SP साहिबा ने खूब दरियादिली दिखाई और रील के चक्कर में युवा रेल बनने से बचें, वरना.. राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. पूर्व CM ने खींचा ‘गुलाबी थैले’ का फोटो 1964 में एक सिनेमा आया। फिल्म थी ‘दूर गगन की छांवों में’। किशोर साहब ने इसमें खूबसूरत गीत गाया-‘कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन..’ बीते हुए दिन तो नहीं लौटते। लेकिन बीते दिनों की यादें जरूर लौटती हैं। कूकस से जयपुर शहर लौटते वक्त पूर्व सीएम साहब की पूर्व यादें भी लौट आईं। हुआ यूं कि पूर्व मुख्यमंत्रीजी कार में थे। बगल से एक महानुभाव बाइक पर निकले। कपड़ों से कतई आम आदमी। बाइक की हालत भी उन्हीं के जैसी। बाइक पर एक रस्सी बंधी थी। जो बताती थी कि महानुभाव बाइक से लॉरी का काम भी लेते हैं। इसी रस्सी के पास गुलाबी रंग का एक थैला टंगा था। थैले पर अशोक गहलोत जी की मंद मुस्कान वाली फोटो। थैले वही थे-गहलोत जी की स्कीम वाले राशन किट वाले। यह दृश्य देख साहब को पुराने दिनों की याद हो आई। जेब से फोन निकाला और चलती बाइक का फोटो खींचने का प्रयास किया। दूसरी बार में सफलता मिल गई। चेहरे पर खुशी और संतोष का भाव। सहायकों से कन्फर्म किया-आ गई? जवाब मिला- हां, आ गई। साहब ने तो फोटो खींची थी, लेकिन पीछे बैठे सहायक वीडियो बना रहे थे। सोशल मीडिया पर आते ही वीडियो वायरल के रूप में प्रसारित हो गया। 2. सांसद महोदय की घड़ी खो गई मुश्किल घड़ी थी। जोधपुर के किसान 80 दिनों से धरने पर बैठे थे। सुनने वाला कोई नहीं। धरने की तरफ झांकने वाला कोई नहीं। किसान कह रहे थे कि रिंग रोड निकलने से खेतों में जाने के रास्ते बंद हो गई। लेकिन किसी को परवाह नहीं। वे सर्विस लेन की मांग कर रहे थे, अंडर पास की मांग कर रहे थे, उचित मुआवजे की मांग कर रहे थे। लेकिन कोई सुनवाई नहीं। आखिर उन्होंने हनुमान का आह्वान किया। हनुमान यानी नागौर सांसद पीले झंडों की लहर के साथ जुलूस के रूप में धरना स्थल पहुंचे। वहीं से प्रशासन को ‘जोधपुर कूच’ की धमकी दे डाली। अब तक जो घड़ी किसानों के लिए मुश्किल थी, वह प्रशासन के लिए मुश्किल हो गई। धमकी मिलते ही प्रशासन के अधिकारी और समस्त जिम्मेदार धरना स्थल की ओर दौड़े। आनन-फानन में प्रमुख मांगों पर सहमति दे दी और जो धरना 80-81 दिन चला, उसका वहीं पटाक्षेप हो गया। लेकिन इस गहमा-गहमी में सांसद महोदय की प्यारी ब्लैक घड़ी खो गई। मंच से ही समाधान निकाला गया। ऐलान किया गया कि MP साहब की घड़ी खो गई है, किसी को मिली हो तो… बात पूरी होती इससे पहले ही हुकमाराम भाकर नाम का युवक घड़ी लेकर मंच की ओर दौड़ता आया। घड़ी सुपुर्द की। लड़के का माल्यार्पण हुआ। सबके लिए बेनीवाल का आगमन मंगल घड़ी साबित हुआ। 3. सवाई माधोपुर SP की ‘दरियादिली’ पुलिसवाले दिन-रात अपराध और अपराधियों से जूझते हैं। पब्लिक की सुरक्षा में रातों जागते हैं। गश्त लगाते हैं। हर वक्त लोगों का दुखड़ा सुनते और लिखते हैं। पुलिसवालों का भी अधिकार है कि खुशी के कुछ पल वे अपने परिवार के साथ बिता सकें। यह बात कौन सोचेगा? यह बात एक पुलिस अधिकारी ने सोची। पुलिस अधीक्षक साहिबा ने सभी अफसरों को आदेश दिया कि आपके अधीनस्थ पुलिसकर्मी माता-पिता, पत्नी-बच्चों या खुद के जन्मदिन पर छुट्टी मांगें तो मंजूर कीजीए। ये अधिकारी हैं सवाई माधोपुर जिले की SP ज्येष्ठा मैत्रेयी। उनके इस आदेश की चर्चा है। महकमे में खुशी का माहौल है। सवाई माधोपुर आने के बाद वे एक थाने का दौरा करने गई थीं। इस दौरान एक पत्रकार ने शिकायत के लहजे में कहा- पहले भी ऐसी चीजें सामने आईं कि जैसे कि पुलिस स्टाफ अधिकारियों को कॉपरेट नहीं करता। आपको क्या लगता है। SP मैडम ने खरा जवाब दिया। कहा- मुझे बिल्कुल ऐसा नहीं लगा। हम सबकी अच्छी टीम भावना है। हम निश्चित तौर पर अच्छे रिजल्ट लाएंगे। जब एक अधिकारी अपने अधीनस्थों के सुख-दुख की परवाह करता है तो अधीनस्थ कॉपरेट करने के लिए जान की बाजी तक लगा देते हैं। 4. चलते-चलते… रील के लिए कई युवा पागलपन की इंतेहां तक पहुंच चुके हैं। न खुद का भला-बुरा सोचते हैं, न दूसरे का। जयपुर में रील बनाने के चक्कर में लड़के ने चलती बाइक पर छेड़छाड़ कर दी। खुद फंसा जो फंसा, तीन दोस्तों को भी फंसवा दिया। पुलिस ने ढूंढ निकाला। सुना है कि बचकर भागने की कोशिश में टांगें टूट गईं। अब बढ़िया खातिरदारी की जाएगी सो अलग। ऐसा ही कुछ कोटा में भी एक लड़के ने कर दिया। दोपहर का वक्त था। नदी के छिछले पानी मगरमच्छ सुस्ता रहे थे। रील बनाने के लिए लड़के ने सुतली बम जलाया और मगरमच्छों की ओर उछाल दिया। पानी में खलबली मच गई। लड़का फरार है। उसे तलाशा जा रहा है। हत्थे चढ़ गया तो पुलिस ढंग से रेल बनाएगी। रेल बने बाद अक्ल आए तो क्या समझदारी? समझदारी तो इसी में है कि जीयें और जीने दें। इनपुट सहयोग- शक्ति सिंह (कोटा), नरेंद्र भारद्वाज (सवाई माधोपुर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल मुलाकात होगी।
