यूपीआई के जरिए 2000 रुपये से ज्यादा भुगतान पाने वाले मर्चेंट को 15 अक्तूबर से 0.4 फीसदी का चार्ज देना होगा। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने इसे ‘यूपीआई टैक्स’ बता कर सरकार से वापस लेने की मांग की है, लेकिन इस मामले में एक बड़े मुद्दे को नजरअंदाज किया जा रहा है। वह मुद्दा है कि यूपीआई बिजनेस से देसी ऐप एक तरह से बाहर क्यों हैं? सरकार खुद अपने ऐप के लिए इस बाजार में जगह क्यों नहीं बनवा पाई?इनके बाद आए विदेशी ऐप का लगभग पूरे बाजार पर कब्जा कैसे हो गया? देसी ऐप की हिस्सेदारी बढ़ाने की कोई ठोस योजना है क्या?
