पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले चंडीगढ़ में आखिरी मेयर के चुनाव को लेकर कांग्रेस मुश्किल में फंस गई है। कांग्रेस यहां मेयर चुनने के लिए गेमचेंजर के रोल में है लेकिन अगर वह आम आदमी पार्टी (AAP) को सपोर्ट करती है तो इसका गलत मैसेज जाएगा। दूसरी तरफ भाजपा है, उन्हें सपोर्ट कर नहीं सकते। ऐसे में कांग्रेस नेता कोई सटीक फैसला नहीं ले पा रहे हैं। कांग्रेस की हालत ऐसी है कि न तो मेयर चुनाव जीत सकते हैं और न ही उसे सीधे तौर पर भाजपा के लिए छोड़ सकते हैं। इसे देखते हुए अब जल्द मीटिंग बुलाई जा रही है। इस बार सीक्रेट बैलेट वोटिंग भी नहीं हो सकती क्योंकि निगम के इतिहास में पहली बार पार्षदों के हाथ खड़े करवाकर वोटिंग कराई जानी है। ऐसे में पार्षदों का पाला बदलना भी मुश्किल है। जानिए, कांग्रेस AAP को सपोर्ट क्यों नहीं करना चाहती
इसकी बड़ी वजह 2027 में पंजाब का विधानसभा चुनाव है। 2026 में होने वाला चंडीगढ़ में इस टर्म का यह 5वां और आखिरी मेयर चुनाव होगा। अगर कांग्रेस की मदद से AAP मेयर चुनाव जीत जाती है तो AAP इसे पंजाब चुनाव में भुनाएगी। जहां कांग्रेस फिलहाल उनकी प्रमुख विपक्षी पार्टी है। ऐसे में मेयर चुनाव में साथ देना तो दूर, कांग्रेसियों को डर है कि अगर पंजाब के वोटरों में गठजोड़ का गलत मैसेज गया तो वहां मुश्किल होगी। निगम में कांग्रेस की स्थिति क्या है?
चंडीगढ़ नगर निगम में कुल 35 पार्षद हैं। मेयर चुनाव में चंडीगढ़ सांसद का वोट भी मान्य होता है। इसके अलावा 9 पार्षद नॉमिनेटेड होते हैं, जिनके पास वोटिंग राइट्स नहीं हैं। ऐसे में 36 वोटों में से भाजपा के पास 16 और AAP के पास 13 वोटें हैं। कांग्रेस के पास 6 पार्षद और सांसद मनीष तिवारी को मिलाकर कुल 7 वोट हैं। मेयर बनाने के लिए कुल 19 वोट चाहिए। अगर बहुमत का यह आंकड़ा किसी के पास भी नहीं है। ऐसे में कांग्रेस जिसके साथ जाएगी, उसका मेयर बनना तय है। कांग्रेस के पास क्या विकल्प बचते हैं?
पंजाब चुनाव को देखते हुए कांग्रेस किसी भी सूरत में AAP के साथ नहीं जाना चाहेगी। हालांकि भाजपा के साथ सेटिंग हो सकती है क्योंकि पंजाब में भाजपा अभी मुख्य मुकाबले से बाहर है। अगर वह भाजपा को मेयर पद पर समर्थन दे देती है तो बाकी 2 पदों सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर पद ले सकती है। ऐसा ही पिछली बार भी हुआ था। 2025 में भाजपा की हरप्रीत कौर बबला 19 वोट लेकर जीत गई जबकि AAP उम्मीदवार प्रेम लता को सिर्फ 17 वोट मिले। हालांकि सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर पद पर कांग्रेस पार्षद चुनाव जीत गए। भाजपा से सेटिंग में कांग्रेस की मुश्किल क्या है?
1996 में बने चंडीगढ़ निगम में अब तक मेयर का चुनाव सीक्रेट बैलेट पेपर वोटिंग से होता रहा है। ऐसे में किसने क्रॉस वोटिंग की, इसका पता नहीं चलता था। मगर, 29 साल बाद निगम की तैयारी है कि हाथ खड़े करवाकर वोटिंग कराएं। निगम ने यह प्रपोजल प्रशासक को भेजा है लेकिन अभी इस पर फैसला नहीं हुआ है। अगर यह मंजूर हुआ तो कांग्रेस के लिए मुश्किल हो सकती है क्योंकि वह सीधे तौर पर भाजपा के साथ सेटिंग पर एक्सपोज हो जाएंगे। हालांकि अगर सीक्रेट बैलेट वोटिंग ही हुई तो फिर कांग्रेस खेल कर सकती है।
