जयपुर के नामी जौहरी थे प्रकाशचंद संचेती। जयपुर से लेकर कई देशों में रत्नों का कारोबार था। एक दिन भारत में तो दूसरे दिन विदेश में रहते थे। लोगों के अनुसार वे गर्मी से बचने के लिए विदेश में कई महीने रुकते थे। फाइव स्टार होटलों और लग्जरी लाइफ में जीवन जीने वाले प्रकाश संचेती और उनकी पत्नी शशि ने इस वैभव को छोड़कर दीक्षा ली थी। इसके बाद वे शालिभद्र मुनि और पत्नी साध्वी शशिकला के नाम से जाने गए। उनकी माता चंपादेवी के कहने के बाद सितंबर 1994 को शालिभद्र मुनि की जयपुर के लाल भवन में दीक्षा हुई थी। इसके बाद शालिभद्र मुनि ने जो तपस्या की, वह कठोर थी। शालिभद्र मुनि ने संत बनकर गर्मी में सूर्य की आतापना की। वहीं सर्दी में खाली बदन रहते हुए कई तपस्याएं कीं। शालिभद्र मुनि का राजस्थान के बालोतरा में गुरुवार रात देवलोकगमन हो गया। वहीं शुक्रवार को शालिभद्र मुनि की डोल यात्रा निकाली गई। जयपुर के बरड़िया कॉलोनी में रहने वाले जौहरी प्रकाश संचेती के सांसारिक जीवन से लेकर शालिभद्र मुनि के साधु जीवन की तपस्या और देवलोकगमन से जुड़ीं कई खास बातें पढ़ें… पहले देखें तस्वीरें सबसे पहले जानें जौहरी प्रकाश संचेती का शुरुआती जीवन
राजस्थान के अलवर में 12 अक्टूबर 1947 को इनका जन्म हुआ। पांच बहनों के इकलौते भाई थे। पिता रतन चंद संचेती ने इनका नाम प्रकाश रखा। बाद में बड़ा बनने की चाहत में प्रकाश चंद अलवर से जयपुर आ गए और रत्नों का व्यवसाय शुरू किया। कुछ ही सालों में उनकी जयपुर में ही नहीं, भारत के कई राज्यों के साथ विदेशों मे भी ख्याति होने लगी। आभूषणों के व्यवसाय के चलते 50 से अधिक देशों में आना-जाना रहता था। विदेशी महंगी कारें, घूमने का शौक था
प्रकाश संचेती की शादी 1969 में हुई। प्रकाश संचेती और उनकी पत्नी शशि जयपुर के अलावा विदेश में ज्यादा समय रहते थे। व्यवसाय में बहुत धन और यश अर्जित किया। बड़े बंगले, विदेशी महंगी कारों का काफिला, घूमने-फिरने का शौक था। जयपुर में सुबोध शिक्षा समिति के संयोजक रहे। एक साल में सुबोध कॉलेज की प्रगति में प्रकाश संचेती का ऐतिहासिक योगदान रहा। मां के दो शब्द- बहुत कमा लिया, अब धर्म कर… ने बदला जीवन
वर्ष 1982 में उनकी माता चंपादेवी ने प्रकाश चंद से कहा- बेटा बस कर, अब और कितना कमाना है। कुछ धर्म करो, साथ तो धर्म ही जाना है, ये धन-दौलत नहीं जाएगी। इन शब्दों के बाद उनके जीवन में बड़ा मोड़ आया। उन्हें जीवन का वैभव और ख्याति सब तुच्छ लगने लगे। वे धर्म की दिशा की तरफ डायवर्ट होने लगे। धीरे-धीरे अपने बिजनेस को सीमित करने लगे। शुरुआत में पति-पत्नी ने आजीवन ब्रह्मचर्य धारण कर लिया। गुरु का साथ मिला तो किशनगढ़ में दीक्षा लेने का संकल्प
उस समय जयपुर में जयंती लाल महाराज जयपुर आए थे। प्रकाश चंद ने उनसे ज्ञान सीखा और कई व्रत अंगीकार किए। गुरु वाणी का ऐसा असर पड़ा कि उनका जीवन पूरी तरह बदलने लगा। एक दिन प्रकाश संचेती और ने दीक्षा लेने का संकल्प कर लिया तो पत्नी शशि ने कहा- मेरे भी दीक्षा के भाव हैं। इसी दौरान जयपुर से ज्ञान गच्छाधिपति तपस्वी चंपालाल महाराज किशनगढ़ से जयपुर जा रहे थे तो प्रकाश संचेती ने भी पैदल ही विहार किया। उन्होंने गुरु के सामने दीक्षा के भाव रखे तो गुरु ने कहा- आपने इतना वैभवपूर्ण जीवन जिया है, आपको ज्ञानगच्छ संप्रदाय की कठिन संयम समाचारी का आभास भी नहीं है। उन्होंने गुरु के समक्ष अपने भाव रखे और कहा कि दीक्षा का मन पक्का है। दीक्षा से पहले करोड़ों की संपत्ति ट्रस्ट को दी
अखिल भारतीय सुधर्म जैन संस्कृति रक्षक संघ जोधपुर की मासिक पत्रिका सम्यग्दर्शन के अनुसार दीक्षा से पहले प्रकाश संचेती ने गुरुदेव प्रकाश मुनि के समक्ष अपनी बात रखते हुए कहा- मैंने संसार के संपूर्ण भौतिक ऐश्वर्य को भोग लिया, सब कुछ कर लिया, लेकिन वे सांसारिक कार्य निरर्थक है। अब मुझे सर्वोत्तम कार्य करना है, आप मुझे अपने चरणों में दीक्षित कीजिए। इसके बाद करोड़ों की संपत्ति एक ट्रस्ट को समर्पित कर दीक्षा ले ली। सादगीपूर्वक जयपुर में ली दीक्षा
प्रकाश संचेती और पत्नी शशि ने करीब 12 साल तक वैराग्य जीवन यानी साधु जैसा जीवन जिया। इसके बाद 8 सितंबर 1994 को उनकी जयपुर के लाल भवन में दीक्षा हुई। पूरी सादगी से दीक्षा कार्यक्रम हुआ, कोई आडंबर नहीं किया। दीक्षा के बाद प्रकाश संचेती का नाम शालिभद्र मुनि और पत्नी शशि का नाम साध्वी शशिकला रखा गया। साधु बनते ही तपस्या शुरू कर दी
साधु बनते ही शालिभद्र मुनि ने कठोर तप संयम का पालन करना शुरू किया। तेले-तेले (तीन दिन का उपवास) पारना करना, पारने में भी आयंबिल करना। पारने में वे सिर्फ सुखी रोटी को पानी में भिगोते और पानी में घुल जाने के बाद पी लेना और बस पारणा कर लेते। भयंकर गर्मी में सूर्य की आतापना लेना, सर्दी में खाली बदन रहना, रातभर जागकर कायोत्सर्ग, ध्यान करना उनकी दिनचर्या बन गई थी। बेटे की तपस्या और संयम देख मां ने दीक्षा ली
इतनी कठोर साधना का पालन देखकर उनकी माता चंपादेवी को भी वैराग्य आ गया। 2 मार्च 2006 को उनकी मां ने भी दीक्षा ग्रहण कर ली। दीक्षा के साथ ही मां ने संलेखना संथारा कर लिया। 24 दिन संथारा रहा और उनका देवलोकगमन हो गया। शालिभद्र मुनि 2018 से बालोतरा में ही
शालिभद्र मुनि विहार करते हुए वर्ष 2018 में बालोतरा आए। इसके बाद से वहीं शालिभद्र मुनि कठोर तपस्या कर रहे थे। हाल ही 5 नवंबर को उन्होंने संथारा ले लिया। खास बात यह है कि इस समय उनके नजदीक उनके मुख्य गुरु प्रकाश मुनि भी गढ़ सिवाणा चातुर्मास कर बालोतरा आए और शालिभद्र मुनि ने उनका आशीर्वाद लिया। वर्धमान स्थानकवासी संस्थान बालोतरा के मंत्री सीए ओमप्रकाश बांठिया ने बताया- शालिभद्र मुनि ने कठोर तपस्या के साथ संथारा लिया तो शुरू में आंखों पर पट्टी बांध दी थी, क्योंकि लोगों का आवागमन शुरू हो गया था। ऐसे में गुरु अपनी तपस्या में ही रहना चाहते थे। यह खबर भी पढ़ें… बालोतरा में शालीभद्र महाराज का संथारा पूरा:16 दिन बाद देवलोक गमन, 1994 में ली थी दीक्षा, बैकुंठ यात्रा निकली बालोतरा में शालीभद्र महाराज ने 16 दिन बाद स्थानक भवन में संथारा पूर्ण किया। शुक्रवार को उन्होंने प्राण त्याग दिए। महाराज की बैकुंठ यात्रा में बड़ी संख्या में लोग उमड़े। शालीभद्र महाराज जयपुर के प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार से जुड़े है। शालीभद्र महाराज का जन्म 12 अक्टूबर 1947 को अलवर में रतन चंद संचेती और चंपा देवी के घर हुआ था। वे पांच बहनों के इकलौते भाई थे। शालीभद्र महाराज का सांसारिक नाम प्रकाश संचेती था। (पूरी खबर पढ़ें)
