मनरेगा के तहत किसानों के खेतों में टांका बनाने पर रोक लगाने के फैसले का निर्दलीय विधायक रवींद्र सिंह भाटी ने विरोध किया है। 21 अक्टूबर को ग्रामीण विकास विभाग की एसीएस ने आदेश जारी कर मनरेगा के तहत टांका बनाने पर रोक लगा दी। रवींद्र भाटी ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। भाटी ने एक्स पर लिखा- हाल ही में सरकार द्वारा जारी आदेश में टांका निर्माण पर रोक लगाने का निर्णय स्थानीय जीवन प्रणाली और जल संचयन दोनों पर गहरा प्रभाव डालने वाला है। यह निर्णय उन लाखों परिवारों के लिए दोहरी मार साबित होगा जो पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहे हैं। थार के निवासी सदियों से वही कर रहे हैं, जिसे आज सतत विकास कहा जाता है। ऐसे में टांका निर्माण पर रोक लगाना इस क्षेत्र की परंपरागत जल संस्कृति के साथ अन्याय है। सरकार बताए, जलशक्ति अभियान में बनाई 47 हजार जल संरचनाएं कहां गईं? भाटी ने लिखा- यदि सरकार को टांका निर्माण के दुरुपयोग को लेकर इतनी चिंता है तो उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि केंद्र सरकार प्रायोजित ‘जल शक्ति अभियान’ के तहत बाड़मेर जिले को देश में सबसे अधिक भूजल पुनर्भरण संरचनाएं बनाने वाला जिला बताया गया है। योजना के आधिकारिक डैशबोर्ड के अनुसार, 2021 से 2024 तक लगभग 1,300 करोड़ रुपए खर्च किए गए और दावा किया गया कि 47,000 से अधिक जल संरचनाएं निर्मित की गईं। वो कहां गई? 2014 से 2024 के बीच भूजल में लगातार गिरावट भाटी ने लिखा- केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि बाड़मेर जिले के अधिकांश निगरानी केंद्रों पर भूजल स्तर में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि 2014 से 2024 के बीच निरंतर गिरावट दर्ज की गई है। इतना ही नहीं, मनरेगा योजना के अंतर्गत भी 2021-22 से 2024-25 के बीच भूजल पुनर्भरण और जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण पर 230 करोड़ रुपए से अधिक का खर्च दर्शाया गया है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि इन संरचनाओं का कोई ठोस अस्तित्व नजर नहीं आता। आज बाड़मेर जिले के कई गांवों में पानी का TDS स्तर 7000 एमजी प्रति लीटर से अधिक पहुंच चुका है। इससे पानी न केवल अस्वास्थ्यकर बल्कि अनुपयोगी भी हो गया है। सरकार को जलप्रबंधन में थार की परंपराओं से सीख लेनी चाहिए भाटी ने लिखा- थार के लोग आधुनिक जल प्रबंधन के सबसे अच्छे उदाहरण है। सरकार को उनकी परंपराओं से सीख लेनी चाहिए, न कि उन्हें समाप्त करने वाले निर्णय लेने चाहिए। सतत विकास का अर्थ तभी सार्थक होगा जब नीति और परंपरा में सामंजस्य स्थापित किया जाए, न कि टकराव। खडीन और टांका थार की जीवनशैली का हिस्सा भाटी ने लिखा- थार मरुस्थल भारत के सबसे विस्तृत और शुष्क क्षेत्रों में से एक है। यहां की जलवायु अत्यंत गर्म, शुष्क और वर्षा अत्यल्प होती है। ऐसी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जल संचयन लोगों के लिए केवल एक आवश्यकता नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। थार में जल संचयन कोई आधुनिक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक परंपरा है। यहां के लोग सदियों से ‘एक-एक बूंद का मोल’ समझते आए हैं। उन्होंने अपने अनुभव, ज्ञान और प्राकृतिक समझ के आधार पर अनेक पारंपरिक जल संचयन प्रणालियां विकसित की है। इनमें खडीन और टांका जैसी प्रणालियां तो यहां की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा हैं। ये भी पढ़ें… सरकार ने ने निजी टांकों के निर्माण पर लगाई रोक:सांसद ने बताया तुगलकी फरमान, विधायक बोले- रेगिस्तान के लोगों की पीठ पर खंजर घोपा है सरकार ने राजस्थान में मनरेगा के तहत हो रहे व्यक्तिगत टांका निर्माण पर रोक लगाने के आदेश जारी किए है। जिसमें लिखा है कि एनएलएम कमेटी की ओर से बाड़मेर में कार्यों की जांच की गई तो पाया गया कि टांके का पानी कृषि एवं सिचाई में उपयोग नहीं किया जाता है। इससे मनरेगा के उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो रही है। इसलिए आगामी आदेशों तक रोक लगा दी है। (पूरी खबर पढ़ें)

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