राजस्थान में पंचायत चुनाव की लॉटरी के बाद 11 जिलों के 23 बड़े राजनीतिक परिवारों को नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। नागौर, जैसलमेर, भरतपुर के 8 परिवार आरक्षण लॉटरी के चलते घरवालों को जिला प्रमुख नहीं बनवा सकेंगे। यहां नया चेहरा आएगा। इधर, जोधपुर, सीकर, चूरू, झुंझुनूं, बीकानेर, बारां, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ में परिवारवाद की राजनीति जारी रहने की संभावना है। नागौर : राजनीतिक परिवारों से नहीं बनेगा जिला प्रमुख लॉटरी में क्या : SC ओपन समीकरण : मिर्धा और बेनीवाल परिवार से कोई जिला प्रमुख पद के लिए खड़ा नहीं हो पाएगा। खास समर्थक को मौका दे सकते हैं। सबसे ज्यादा प्रभाव कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे रामनिवास मिर्धा और रामरघुनाथ चौधरी परिवार का रहा है। रामदेव बेनीवाल व महेंद्र चौधरी के परिवारों का भी दबदबा रहा। किसान केसरी बलदेव राम मिर्धा के पोते और रामनिवास मिर्धा के बेटे हरेन्द्र मिर्धा भी जिला प्रमुख रह चुके हैं। रामरघुनाथ चौधरी नागौर से कांग्रेस के सांसद व दिग्गज नेता रहे। उनके भाई पूर्व मंत्री अजयसिंह किलक बीजेपी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। बहन बिंदु चौधरी यहां से तीन बार जिला प्रमुख रहीं। रामदेव बेनीवाल और बेटे हनुमान बेनीवाल ने मजबूत पकड़ बनाई है। 2015 में कांग्रेस विधायक महेंद्र चौधरी ने पत्नी सुनीता चौधरी को जिला प्रमुख बनवाया और बीजेपी को हराया। 2020 के चुनाव में सामान्य सीट थी। बीजेपी ने परिवार के बजाय कार्यकर्ता माने जाने वाले भागीरथ चौधरी को जिला प्रमुख पद के लिए उम्मीदवार बनाया। इससे भितरघात हुआ। एक सदस्य ने कांग्रेस के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की। मुकाबला 19-19 वोट से टाई हो गया। हालांकि लॉटरी में भाजपा प्रत्याशी भागीरथ चौधरी जीत गए। जोधपुर : बरकरार रह सकता है मदेरणा परिवार का प्रभाव 2015 से 2020 तक का कार्यकाल छोड़ दें, तो यहां जिला प्रमुख का पद हमेशा कांग्रेस के कब्जे में रहा है। 1982 से भी पहले से यहां मदेरणा परिवार का एकतरफा प्रभाव रहा है। परसराम मदेरणा के बेटे पूर्व कैबिनेट मंत्री रहे महिपाल मदेरणा भी जिला प्रमुख रहे। बीजेपी 2015 में कांग्रेस के इस गढ़ में जीती थी। पिछले चुनाव में एक बार फिर मदेरणा परिवार ने ताकत दिखाई। ये सीट उस वक्त सामान्य महिला की थी। लीला मदेरणा जिला प्रमुख बनीं। बीजेपी की प्रत्याशी चंपा देवी को 5 वोट से हराया। इस बार भी उनका ही दावा रहेगा। सीकर : महरिया-नारायण सिंह परिवार के लिए मौका कांग्रेस से महरिया परिवार और भाजपा से बाजौर का प्रभाव है। रामदेव सिंह महरिया जिला प्रमुख के अलावा 7 बार विधायक और मंत्री रहे। सुभाष महरिया 3 बार सांसद और केंद्रीय मंत्री भी रहे। नंदकिशोर महरिया विधायक रहे और रामेश्वर महरिया भी लगातार 17 वर्षों तक प्रधान रहे। इधर, भाजपा के शेखावाटी में बड़े नेता माने जाने वाले पूर्व विधायक प्रेम सिंह बाजौर का भी दबदबा है। पिछली दोनों बार उन्होंने जिला प्रमुख का पद बीजेपी की झोली में डाला। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष नारायण सिंह का परिवार भी जिले में अच्छी पकड़ रखता है। उनके बेटे वीरेंद्र सिंह दांतारामगढ़ से दूसरी बार विधायक बने। 2015 में रीटा सिंह जिला प्रमुख बनी थीं। पिछला चुनाव प्रेम सिंह बाजौर की पुत्रवधु गायत्री जीती थीं। कांग्रेस प्रत्याशी सोहनी को 15 मतों पर संतोष करना पड़ा। जैसलमेर : 3 बार जिला प्रमुख फकीर परिवार से मुस्लिम समाज के धर्मगुरु रहे गाजी फकीर, गहलोत सरकार में मंत्री रहे सालेह मोहम्मद सहित पूरे परिवार का प्रभाव है। तीन बार तो फकीर परिवार का सदस्य ही जिला प्रमुख बना। यहां लोगों की नजरें इसलिए हैं कि पिछला चुनाव सबसे ज्यादा उठापटक वाली जगहों में से एक रहा था। 4 सदस्यों की क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस का किला ध्वस्त हो गया। बीजेपी के प्रताप सिंह सोलंकी जिला प्रमुख बने। तत्कालीन विधायक रूपाराम की बेटी व बेटे पर क्रॉस वोटिंग के आरोप लगे। बीजेपी ने दो दशक बाद यहां जीत दर्ज की। पिछला चुनाव भाजपा उम्मीदवार प्रताप सिंह 12 वोट हासिल कर जीते। फकीर परिवार से ताल्लुक रखने वाली कांग्रेस प्रत्याशी रुकैया खातून को केवल 5 वोट मिले। चूरू : नहीं बदले समीकरण, वंशवाद जारी रहेगा जिला प्रमुख और पंचायती राज चुनावों में मुख्य रूप से रावताराम, सारण और कस्वां जैसे परिवार विशेष दबदबा रखते हैं। इसके अलावा राजेंद्र राठौड़ और उनके समर्थक भी अहम भूमिका निभाते हैं। पिछला चुनाव बीजेपी से जीतीं वंदना आर्य के दादा ससुर स्वर्गीय रावताराम आर्य चूरू जिले के प्रथम जिला प्रमुख और पांच बार विधायक रहे थे, जबकि उनके ससुर मोहनलाल आर्य भी दो बार जिला परिषद सदस्य रह चुके हैं। 2015 के चुनाव की बात करें, तो वर्तमान विधायक हरलाल सारण तब जिला प्रमुख का चुनाव जीते थे। वहीं, सांसद-विधायक रह चुके दीपचंद कस्वां के बेटे रामसिंह कस्वां चूरू लोकसभा सीट से चार बार सांसद व विधायक रह चुके हैं। रामसिंह कस्वां के बेटे राहुल कस्वां वर्तमान में चूरू से सांसद हैं। पिछला बार ये सीट अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित थी। वंदना आर्य 15 वोट से चुनाव जीती थीं। झुंझुनूं : ओला-खीचड़ परिवार की महिला हो सकती है दावेदार पूर्व कैबिनेट मंत्री रहे शीशराम ओला का परिवार और खीचड़ परिवार सबसे प्रभावी रहा है। ओला ने जिला प्रमुख पद से राजनीतिक शुरुआत की थी। 16 साल तक पद पर रहे थे। 2000 में उनके बेटे विधायक और गहलोत सरकार में मंत्री रहे बृजेंद्र ओला जिला प्रमुख बने। इसके बाद 2005 से 2010 तक उनकी पत्नी राजबाला ओला जिला प्रमुख रहीं। पिछली बार ओबीसी वर्ग महिला की सीट थी। पूर्व सांसद नरेंद्र खीचड़ की पुत्रवधू हर्षिनी कुलहरि 17 वोट से जीती थीं। बीकानेर : मेघवाल-डूडी परिवार में प्रतिष्ठा की जंग नेता प्रतिपक्ष रहे रामेश्वर डूडी के परिवार और पूर्व मंत्री गोविंद राम मेघवाल जैसे नेताओं के परिवारों का प्रभाव रहा है। डूडी परिवार का यहां इतना प्रभाव रहा है कि बीकानेर जिला प्रमुख का पिछला चुनाव एकतरफा हो गया था। साल 2000 से लेकर 2010 तक रामेश्वर डूडी जिला प्रमुख रहे। इसके बाद से अब तक उनके समर्थक को ही लगातार ये पद मिला है। डूडी अब नहीं रहे, ऐसे में उनकी पत्नी विधायक सुशीला डूडी पर ज्यादा जिम्मेदारी रहेगी। पिछले चुनाव में सीट एससी ओपन के आरक्षित लिए थी, इसमें डूडी समर्थक मोडाराम मेघवाल जिला प्रमुख प्रमुख बने थे। भरतपुर : राजनीतिक परिवारों को किसी समर्थक पर लगाना होगा दांव भरतपुर के पूर्व राजपरिवार से विश्वेंद्र सिंह, पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह और कुछेक राजनीतिक परिवारों का प्रभाव रहता है। यहां से पिछली बार पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के बेटे और दो बार विधायक रहे जगत सिंह ने जिला प्रमुख का पद हासिल किया। पिछले चुनाव से पहले यहां बीना सिंह फौजदार जिला प्रमुख रहीं, जो राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनके पति डॉ. जितेंद्र सिंह फौजदार बीजेपी जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। इस पद पर पिछले बीस साल से अधिकतर बार बीजेपी या उसके समर्थक काबिज रहे हैं। पिछले चुनाव में नटवर सिंह के बेटे जिला प्रमुख बने थे। कांग्रेस ने क्रॉस वोटिंग की थी। बारां : नहीं बदलेगा वंशवाद का समीकरण जिला प्रमुख पद के चुनाव के लिए सबसे अधिक प्रभावशाली कांग्रेस नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रमोद जैन भाया का परिवार है। पिछली बार उन्होंने अपनी पत्नी उर्मिला जैन भाया को जिला प्रमुख बनवाने में सक्रिय भूमिका निभाई। पिछले चुनाव में क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस जीती थी। बीजेपी के पास बहुमत होने के बावजूद भाया की पत्नी उर्मिला जैन भाया जीत गईं थीं। बांसवाड़ा : मालवीय परिवार मजबूत 2000 से 2010 तक कांग्रेस के बड़े आदिवासी नेता माने जाने वाले और गहलोत कैबिनेट में मंत्री रहे महेंद्रजीत सिंह मालवीय जिला प्रमुख रहे। इसके बाद से ही लगभग हर बार कांग्रेस से उनकी पत्नी जिला प्रमुख बनती आ रही हैं। पिछले चुनाव में यहां से जिला प्रमुख चुनाव में कांग्रेस पार्टी की रेशम मालवीय लगातार तीसरी बार विजयी हुईं। मालवीय परिवार ने इस पद पर 5वीं बार कब्जा जमाया। रेशम मालवीय को 21 वोट मिले। उनके सामने बीजेपी की प्रत्याशी हकरु मईड़ा थीं, जिन्हें केवल 9 वोट मिले। प्रतापगढ़ : राजनीतिक परिवारों से हो सकती हैं दावेदार 2 मीणा परिवारों का दबदबा यहां जिला प्रमुख के चुनाव में दो मीणा परिवारों का बोलबाला रहता है। सात बार विधायक, मंत्री और सांसद रहे नंदलाल मीणा का परिवार बीजेपी और पूर्व विधायक रामलाल मीणा कांग्रेस से जुड़े हैं। नंदलाल मीणा की पत्नी चित्तौड़गढ़ की जिला प्रमुख रही हैं। पिछले चुनाव में रामलाल मीणा की पत्नी इंद्रा देवी मीणा ने जीत हासिल की। इंद्रा मीणा ने नंदलाल मीणा की पुत्रवधू और भजनलाल सरकार में राजस्व मंत्री हेमंत मीणा की पत्नी सारिका मीणा को हराया था। इंद्रा मीणा को 17 में से 10 वोट मिले। कांग्रेस के पास 8 ही वोट थे। बीजेपी में क्रॉस वोटिंग के चलते उन्हें 2 मत ज्यादा मिले। ये खबरें भी पढ़ें
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