आज सावन के पहले दिन हम आपके राजस्थान के ऐसे शिव मंदिर के दर्शन करवा रहे हैं, जहां पहुंचना काफी मुश्किल है। अरावली की तलहटी और घने जंगल में विराजे महादेव के दर्शन के लिए श्रद्धालु करीब 3600 फीट ऊंचा पहाड़ पार कर पहुंचते हैं। रास्ता ऐसा कि जरा सी चूक आपको खाई में पहुंचा सकती है। इसके बाद भी पूरे सावन माह में ये जंगल-पहाड़ श्रद्धालुओं के जयकारों से गूंजते रहते हैं। ये मंदिर है परशुराम महादेव का। मान्यता है कि सादड़ी (पाली) में स्थित यह मंदिर, जिस गुफा में है उसे भगवान परशुराम ने अपने फरसे से बनाया था। इसके बाद उन्होंने यहां तपस्या की थी। जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें यहां दर्शन दिए थे। तभी से यहां स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है। पहाड़ियों से गिरता पानी यहां मौजूद शिवलिंग का अभिषेक करता है। सबसे पहले देखिए- मंदिर की PHOTOS खतरनाक जंगल के बीच ढाई किलोमीटर का सफर मंदिर तक पहुंचने के लिए आबादी एरिया से ढाई किमी का रास्ता तय करना पड़ता है। इस दौरान करीब पांच सौ सीढ़ियां भी आती हैं। ये सीढ़ियां बड़ी-बड़ी चट्‌टानों के बीच से गुजरती हैं। इन्हीं श्रद्धालुओं के बीच हमने भी अपनी यात्रा शुरू की। ऊपर जाते समय ऐसा लगता है जैसे हम पहाड़ नहीं बादलों की चढ़ाई कर रहे हों। धीर-धीरे बादल हमसे नीचे हो जाते हैं। मंदिर के रास्ते में नौ कुंड और कई छोटे देवालय आते हैं। मंदिर से काफी पहले धर्मशालाएं और सामाजिक भवन शुरू हो जाते हैं। जहां श्रद्धालुओं के लिए हर तरह की सुविधा होती है। कई लोग यहां मन्नत पूरी होने पर प्रसादी भी करते हैं। पवित्र गुफा में झूलती चट्‌टानों से होता है जलाभिषेक पांच सौ सीढ़ियां चढ़ने के बाद पहाड़ के सबसे ऊपरी हिस्से पर दिखाई देती है पवित्र गुफा। जैसे ही ये गुफा दिखाई देती है श्रद्धालुओं का जोश और आनंद दुगुना हो जाता है। वे भगवान परशुराम का जयकारा लगाते हैं और आगे बढ़ते हैं। गुफा के आसपास का वातावरण बेहद मनमोहक और आनंद देने वाला है। गुफा में जाने के लिए थोड़ा सा झुकना पड़ता है। अंदर जाते ही सामने भगवान परशुराम महादेव के दर्शन होते हैं। अब देखिए- इस प्राचीन शिव मंदिर की अनोखी तस्वीरें
गंगाजल के समान यहां का जल मान्यता है कि त्रेतायुग में ये शिवलिंग यहां अपने आप प्रकट हुआ था और तब से यहीं विराजमान है। शिवलिंग के ऊपर चारों और चट्‌टाने हैं, जिन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे ये गुफा की छत से लटकर झूल रही हैं। इन्हीं चट्‌टानों के बीच ठीक शिवलिंग के ऊपर गोमुख आकार का प्राकृतिक चट्टान है, जिससे साल भर भगवान का जलाभिषेक होता रहता है। ये पानी कहां से आता है, कोई नहीं जानता, लेकिन यहां आने वाले लोग इसे गंगाजल के समान पवित्र मानते हैं। कई लोग इसे अपने साथ भी ले जाते हैं। अब जानें- कैसे पहुंचे मंदिर तक ये मंदिर पाली जिले के सादड़ी उपखंड से मंदिर करीब 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सादड़ी से मंदिर तक पहुंचने के लिए गाड़ी से कुंडधाम मंदिर तक आ सकते हैं। इसके बाद वहां से अरावली की दुर्गम पहाड़ियों में करीब ढाई किलोमीटर की चढ़ाई करनी पड़ती है। राजसमंद की ओर से जाने पर कुंभलगढ़ क्षेत्र के फूटा देवल मंदिर से करीब ढाई किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है। इस तरह करीब 3600 फीट की ऊंचाई पार कर करीब 10 बाई 10 फीट की गुफा में स्वयंभू शिवलिंग परशुराम महादेव के दर्शन होते हैं। यहां मुख्य मंदिर, फूटा देवल और कुंडधाम के अलावा भगवान गणेश का मंदिर और 9 अन्य कुंड मौजूद हैं। मान्यता है कि ये सभी कुंड कभी नहीं सूखते। हर दिन आते हैं 10 हजार से ज्यादा भक्त मंदिर में सावन के महीने में हर दिन करीब 10 हजार श्रद्धालु पहुंचते हैं। वहीं सोमवार के दिन यह संख्या लगभग दोगुनी हो जाती है। इस दौरान भक्तों को दर्शन के लिए 4 से 5 घंटे लाइन में इंतजार करना पड़ता है। पाली, सिरोही, राजसमंद, उदयपुर सहित प्रदेश और गुजरात से भी श्रद्धालु यहां दर्शनों के लिए पहुंचते हैं।