जोधपुर की पारंपरिक मोजरी (जूती) को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग मिल गया है। इससे मोजरी को दुनियाभर में पहचान मिलेगी। केंद्र सरकार की जियोग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री ने जोधपुर हैंडीक्राफ्ट एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन और ग्राम विकास सेवा संस्थान को जीआई प्रमाण पत्र सौंपा है। दोनों संस्थान ने साल 2021 में केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय और विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) के सहयोग से जीआई टैग के लिए आवेदन किया था। जोधपुर के हैंडीक्राफ्ट उद्योग के लिए इसे बड़ी उपलिब्ध माना जा रहा है। करीब 200 साल पुराने जोधपुरी मोजरी उद्योग का घेरलू बाजार वर्तामान में लगभग 100 करोड़ का है। जबकि 10 करोड़ रुपए का एक्सपोर्ट हो रहा है। इस इंडस्ट्री से जुड़े एक्सपर्ट का अनुमान है कि जीआई टैग मिलने के बाद निर्यात बढ़ेगा और दो सालों में कारोबार दोगुना सकता है। जोधपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों परिवार मोजरी निर्माण से जुड़े है। 6 और जीआई टैग लाइन में इससे पहले जोधपुर बंधेज क्राफ्ट को जीआई टैग मिल चुका है। इससे उसके कारोबार में 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गइ। अब जोधपुरी साफा, मथानिया की लाल मिर्च, वुडन एंड आयरन क्राफ्ट, मारवाड़ का जीरा, जोधपुरी पत्थर की छतरियां और लहरिया के जीआई टैग की प्रक्रिया जारी है। ब्रांडिंग, ई-कॉर्मस और निर्याल के लिए चलेगा अभियान जेएचईए के अध्यक्ष डॉ. भरत दिनेश ने बताया कि अब मोजरी उद्योग के विकास के लिए अभियान चलाएंगे। कारीगरों के कौशाल विकास, आधुनिक डिजाइन, गुणवत्ता सुधार, ब्रांडिंग, ई-कॉमर्स, अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शिनियों में भागीदारी, निर्यात संवर्धन व विपणन सहायता जैसे कार्यक्रम संचालित किए जाएंगे। क्या है जीआई टैग किसी विशेष क्षेत्र की पहचान बन चुके ऐसे प्रोडक्ट, जिनकी क्वालिटी और स्पेशलिटी उस जगह से जुड़ी हो उन्हें जीआई टैग दिया जाता है। इससे नेशनल और इंटरनेशल स्तर पर पहचान मिलने के साथ ही नकली-फर्जी प्रोडक्ट पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। स्थानीय कारीगरों और उत्पादकों को बेहतर कीमत मिलेगी। पारंपरिक कला, शिल्प और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षण मिलेगा और रोजगार को भी बढ़ावा मिलेगा।