राजस्थान हाईकोर्ट ने म्यांमार के रहने वाले 3 रोहिंग्या आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने मोहम्मद उस्मान, शफी आलम उर्फ शोफी आलम और रबी उल इस्लाम की जमानत अर्जी को नामंजूर कर दिया। तीनों आरोपियों पर आरोप है कि वे पिछले कई सालों से भारत में अपनी पहचान छिपाकर रह रहे थे। इस दौरान वे कई बार अवैध तरीके से बांग्लादेश भी गए। साल 2023 में अपनी गिरफ्तारी से पहले ये आरोपी बांग्लादेश से 30 लड़कियों को अवैध रूप से भारत लेकर आए थे। इन्होंने इन लड़कियों को हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, असम और राजस्थान में लाकर बेच दिया। देशभर में इन आरोपियों के खिलाफ मानव तस्करी (ह्यूमन ट्रैफिकिंग) के कई मामले दर्ज हैं। NIA ने खुफिया इनपुट के आधार पर इन्हें राजस्थान और हरियाणा से गिरफ्तार किया था। साल 2024 में जयपुर की एनआईए की विशेष अदालत से जमानत खारिज होने के बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने भी खारिज कर दिया है। रोहिंग्या लड़कियों को भारतीय समाज में बसाने की थी साजिश NIA की ओर से पैरवी करते हुए वकील स्नेहदीप ख्यालिया ने कोर्ट को बताया कि ये तीनों आरोपी साल 2011-12 में सीमा पार करके बांग्लादेश के रास्ते भारत आए थे। इनमें से मोहम्मद उस्मान जम्मू-कश्मीर में, शफी आलम तेलंगाना में और रबी उल इस्लाम नूंह (हरियाणा) में अपनी पहचान छिपाकर रह रहे थे। तीनों ने भारत में फर्जी दस्तावेजों के जरिए आधार कार्ड बनवाए, मोबाइल सिम लीं और बैंक खाते भी खुलवा लिए थे। इनकी साजिश रोहिंग्या लड़कियों को भारतीय समाज में स्थापित (बसाने) करने की थी, ताकि जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल देश विरोधी गतिविधियों में किया जा सके। इसी साजिश के तहत इन्होंने कई लड़कियों को भारत लाकर अलग-अलग शहरों में उनकी शादियां भी करवाईं। गवाहों और पीड़ितों के बयान होना अभी बाकी वकील स्नेहदीप ख्यालिया ने जमानत का विरोध करते हुए दलील दी कि यदि आरोपियों को जमानत मिलती है, तो उनके देश छोड़कर भागने का पूरा खतरा रहेगा। इस मामले में अभी कई महत्वपूर्ण गवाहों, पीड़ितों और शिकायतकर्ताओं के बयान दर्ज होना बाकी हैं। ऐसे में आरोपियों को जमानत नहीं दी जानी चाहिए। वहीं, आरोपियों के अधिवक्ता ने दलील दी कि इस मामले में तीनों को झूठा फंसाया गया है। केस में महत्वपूर्ण गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं और आरोपी पिछले 2 साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं। चूंकि ट्रायल पूरा होने में लंबा समय लग सकता है, इसलिए उन्हें जमानत का लाभ दिया जाए। दोनों पक्षों की गंभीर बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी।
