कोलाज ऑफ किलकारी के चौथे केंद्र जामडोली स्थित ब्रह्मचारी रामानुजाचार्य ऑडिटोरियम में मंगलवार को बाल रामायण पर आधारित नाटक ‘रघुकुल कथा वाचन’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। प्रस्तुति के माध्यम से बच्चों ने रघुकुल की गौरवशाली परंपरा, गुरु-शिष्य संबंधों और संस्कार आधारित शिक्षा के महत्व को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। नाटक का निर्देशन एवं समूह संचालन हरि प्रसाद वैष्णव और अक्षय असोपा ने किया। कथा में राजा दशरथ के चारों पुत्रों राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के बाल्यकाल, उनकी शिक्षा-दीक्षा तथा महर्षि वशिष्ठ के मार्गदर्शन में हुए चरित्र निर्माण को दर्शाया गया। प्रस्तुति में यह संदेश दिया गया कि गुरुकुल केवल अक्षर ज्ञान का केंद्र नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों और व्यक्तित्व निर्माण की कार्यशाला हुआ करते थे। नाटक में दिखाया गया कि किस प्रकार राजा दशरथ ने अपने पुत्रों को महर्षि वशिष्ठ के संरक्षण में सौंपकर उन्हें मर्यादा, अनुशासन, सेवा, श्रम और नैतिकता के संस्कार प्रदान किए। इसी शिक्षा ने राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया और रघुकुल को आदर्श परंपरा के रूप में स्थापित किया। प्रस्तुति के दौरान कलाकारों ने वर्तमान समय की शिक्षा व्यवस्था और प्राचीन गुरुकुल परंपरा के बीच अंतर को भी रेखांकित किया। नाटक में यह प्रश्न उठाया गया कि आज तकनीक और डिजिटल युग में ज्ञान तो सुलभ हो गया है, लेकिन क्या बच्चों में संस्कार, आदर-भाव और नैतिक जिम्मेदारियों का विकास भी उतनी ही गंभीरता से हो पा रहा है। ‘गुरुकुल से गूगल तक’ की इस यात्रा को नाटक ने संवेदनशील और विचारोत्तेजक तरीके से प्रस्तुत किया। करीब 25 बाल कलाकारों ने अपने अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। नाटक में दीक्षा सैनी ने राजा दशरथ, सोनिया शर्मा ने कौशल्या, खुशी सैनी ने सुमित्रा, चंचल सैनी ने कैकई, शिवानी मीणा ने बाल राम, आंकाशा सैनी ने महर्षि वशिष्ठ, गीत शर्मा ने राम, चेतना ओझा ने लक्ष्मण, अर्पिता शर्मा ने भरत, विदिशा गुर्जर ने शत्रुघ्न, हिमांक खदाव ने देवदत्त (शिष्य), हिंताशी कंवर ने मां शारदा तथा सोनाक्षी ने सेवक की भूमिका निभाई। कोरस में रेखा शर्मा, कल्पना सिंह, हिमांक खदाव, चांदनी ओझा, वर्षा गुर्जर, सोनिया मीणा, राजश्री शर्मा और पलक शर्मा ने सहभागिता कर प्रस्तुति को और प्रभावशाली बनाया। कोलाज ऑफ किलकारी के वर्कशॉप डिजाइनर एवं वर्कशॉप डायरेक्टर गगन मिश्रा ने बताया कि यह कार्यशाला जयपुर के चार केंद्रों पर 22 से 25 दिनों तक आयोजित की गई, जिसमें बच्चों को अभिनय, अभिव्यक्ति, मंच अनुशासन और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित कराया गया। उन्होंने कहा कि ‘रघुकुल कथा वाचन’ केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को कर्म, श्रम, संस्कार और नैतिक मूल्यों से जोड़ने का एक प्रयास है। कार्यक्रम के अंत में दर्शकों ने बाल कलाकारों के अभिनय की सराहना करते हुए नाटक को प्रेरणादायक और समयानुकूल बताया। प्रस्तुति ने यह संदेश दिया कि बदलते समय में भी भारतीय संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा और नैतिक मूल्यों को जीवित रखना समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
