झुंझुनूं जिला उपभोक्ता आयोग ने LIC को फटकार लगाई है। आयोग अध्यक्ष मनोज कुमार मील ने कहा- 9 साल 4 महीने तक किसान की मौत के बाद विधवा महिला को इंश्योरेंस प्रीमियम के लिए दर-दर भटकना पड़ा। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बनाए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की हत्या करने जैसा है। अध्यक्ष ने फैसले की एक कॉपी मुख्य सचिव के पास भेजी है। ताकि किसानों और मजदूरों के मामलों में गाइडलाइन बनाई जा सके। वहीं अध्यक्ष ने वकीलों से अपील की है कि साल में किसी एक गरीब का केस मुफ्त में लड़ें। आयोग ने LIC को 5 लाख 54 हजार 275 रुपए, 85 हजार रुपए की पेनल्टी और 1.5 लाख रुपए (डेढ़ लाख रुपए) विशेष क्षतिपूर्ति राशि देने का आदेश दिया है। वहीं इंश्योरेंस को लेकर कहा कि प्रीमियम लेने के बावजूद जब क्लेम की बारी आती है तो उपभोक्ता को कानूनी पचड़ों में फंसा देते हैं। पहले पढ़िए क्या था मामला… 395 किसानों ने करवाई थी पॉलिसी मामला सहकार जीवन सुरक्षा बीमा योजना में भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की लापरवाही का है। झुंझुनूं की चुड़ैला ग्राम सेवा सहकारी समिति के 395 किसानों ने सहकार जीवन सुरक्षा योजना के तहत बीमा प्रीमियम की राशि जमा करवाई थी। इसमें चुड़ैला निवासी श्योराम ने 14 अगस्त 2012 को पॉलिसी ली थी। इसके 160 रुपए वह हर महीने दे रहे थे। श्योराम की 17 फरवरी 2013 को मौत हो गई। उनकी पत्नी सजना देवी ने 8 मार्च 2013 को इंश्योरेंस राशि का भुगतान करने के लिए LIC से संपर्क किया। इसके बाद LIC टालमटोल करती रही। LIC की और से श्योराम के नाम की एंट्री ही नहीं मिली। इसके बाद 14 दिसंबर 2016 को सजना देवी ने जिला उपभोक्ता आयोग में मामला प्रस्तुत किया था। ​अब पढ़िए उपभोक्ता आयोग की टिप्पणी क्लेम के वक्त मानसिक प्रताड़ना आयोग ने फैसला सुनाते हुए कहा- ग्रामीण और किसान उपभोक्ताओं से योजनाओं के नाम पर समय पर पैसा (प्रीमियम) तो ले लिया जाता है, लेकिन जब क्लेम देने का वक्त आता है, तो उन्हें अंतहीन कानूनी पचड़ों और मानसिक प्रताड़ना के जाल में फंसा दिया जाता है। ‘कानून की आत्मा की हत्या’ आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार मील ने कहा- उपभोक्ताओं को जल्दी और आसान न्याय दिलाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम’ लाया गया था। ​वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में साल 2019 में इस कानून को और ज्यादा मजबूत बनाया गया ताकि जनता को परेशान न होना पड़े। ​इसके बावजूद एक पीड़ित महिला को 9 साल 4 महीने तक न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ा, जो इस कानून की आत्मा की हत्या करने जैसा है। आयोग ने इस निर्णय की कॉपी सीधे मुख्य सचिव (Chief Secretary) को भेजी है, ताकि किसानों की योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए सख्त गाइडलाइन बनाई जा सके। आयोग अध्यक्ष मनोज कुमार मील ने वकीलों से अपील की है। उपभोक्ता कानून के त्वरित न्याय के सपने को सच करने के लिए वकील आगे आएं। साल में कम से कम एक मामला किसी गरीब या जरूरतमंद के लिए बिल्कुल मुफ्त लड़ें।