जोधपुर की स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने उदयपुर सिटी रेलवे स्टेशन के तत्कालीन चीफ बुकिंग सुपरवाइजर (सीबीएस) को सरकारी दस्तावेजों में गलत तरीके से बनाने का दोषी करार देते हुए सजा सुनाई है। विशिष्ट न्यायाधीश (सीबीआई) भूपेन्द्र कुमार सनाढ्य ने उदयपुर सिटी रेलवे स्टेशन के तत्कालीन सीबीएस रघुनन्दन व्यास को 3-3 साल के कठोर कारावास और कुल 2 लाख रुपए के अर्थदण्ड से दंडित किया है। हालांकि, अदालत ने ‘मनी ट्रेल’ और ‘आपराधिक कब्जे’ के सीधे प्रमाण न होने के कारण अभियुक्त को अमानत में खयानत (गबन), धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसी एक्ट) के आरोपों से संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया है। इंटरनल ऑडिट और रिकॉन्सीलेशन में पकड़ा गया फर्जीवाड़ा यह मामला वर्ष 2014 का है, जब उदयपुर सिटी रेलवे स्टेशन पर तैनात चीफ बुकिंग सुपरवाइजर रघुनंदन व्यास द्वारा बैंक में आय जमा कराने की प्रक्रिया में विसंगतियां पाई गई थीं। रेलवे की राजस्व प्रणाली के अनुसार, स्टेशन की प्रतिदिन की आय (बुकिंग, आरक्षण, पार्सल आदि) को ‘डेली ट्रेन कैश’ (डीटीसी) बुक में दर्ज किया जाता है। ट्रेजरी रेमिटेन्स नोट (TR नोट) के माध्यम से ‘रेल शक्ति’ खाते में जमा कराया जाता है। सीबीआई जांच और रिकॉर्ड के मिलान में सामने आया कि सितम्बर 2013 से दिसम्बर 2013 के बीच करीब 11.28 लाख रुपये की ‘अस्थायी कमी’ (शॉर्ट डिपोजिट) रही। इसके बाद जनवरी से अप्रैल 2014 के बीच अभियुक्त ने 25 अलग-अलग अवसरों पर वास्तविक आय से कम राशि बैंक में जमा की, जिससे 9,82,200 रुपए का मिसमैच पाया गया। यह हेराफेरी तब पकड़ी गई जब उत्तर पश्चिम रेलवे अजमेर के यातायात लेखा कार्यालय (TA Office) के डेबिट आंकड़ों का मिलान एसबीआई की जयपुर स्थित फोकल ब्रांच के क्रेडिट आंकड़ों से किया गया। बचाव पक्ष ने बीमारी और अभियोजन ने 28 फर्जी रसीदों का दिया हवाला सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने अभियुक्त के प्रति नरमी बरतने की अपील की। उन्होंने दलील दी कि 68 साल अभियुक्त पिछले 11 सालों से ट्रायल का सामना कर रहा है। उसे जुलाई 2014 में ही बर्खास्त किया जा चुका है, जिससे वह पेंशन आदि लाभों से भी वंचित है। वकील ने कोर्ट को बताया- ट्रायल के दौरान ‘बयान मुल्जिम’ के प्रक्रम पर अभियुक्त की तबीयत इतनी बिगड़ गई थी कि उसे खून की उल्टियां होने लगीं और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। वहीं, सीबीआई के विशिष्ट लोक अभियोजक भगवानसिंह भंवरिया ने कठोर सजा की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि अभियुक्त ने अपनी हेराफेरी छिपाने के लिए 28 कंप्यूटर जनरेटेड जाली रसीदें तैयार कीं। इन रसीदों को असली बताकर रेलवे रिकॉर्ड में शामिल किया गया, ताकि यह दिखाया जा सके कि पूरी राशि बैंक में जमा हो चुकी है। अभियोजन के अनुसार, लोक सेवक द्वारा किया गया ऐसा गंभीर अपराध समाज में गलत संदेश देता है। मनी ट्रेल के अभाव में गबन से बरी, पर कूटरचना प्रमाणित कोर्ट ने अपने विस्तृत विश्लेषण में स्पष्ट किया कि अभियुक्त रघुनंदन व्यास को गबन (धारा 409), धोखाधड़ी (420) और पीसी एक्ट की धाराओं से क्यों बरी किया जा रहा है। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर पाया कि जो राशि बैंक में कम जमा हुई, वह सीधे तौर पर अभियुक्त ने अपने कब्जे में ली या उसका व्यक्तिगत उपयोग किया। साथ ही, किसी ‘विशिष्ट व्यक्ति’ के साथ छल का तत्व भी प्रमाणित नहीं हो सका। हालांकि, कोर्ट ने आधिकारिक रिकॉर्ड में जाली प्रविष्टियां करने और फर्जी रसीदें तैयार करने को अत्यंत गंभीर माना। जजमेंट में टिप्पणी की गई कि ‘मूल्यवान प्रतिभूति’ की कूटरचना सामान्य अपराध नहीं है, जिसके लिए विधायिका ने आजीवन कारावास तक का प्रावधान रखा है। कोर्ट ने माना कि कूटरचित दस्तावेज तैयार कर रेलवे सिस्टम को गुमराह करना सार्वजनिक विश्वास के साथ खिलवाड़ है। आदेश: न्यूनतम सजा का प्रावधान और अर्थदण्ड कोर्ट ने अभियुक्त रघुनंदन व्यास की आयु, लंबी न्यायिक प्रक्रिया और खराब स्वास्थ्य को ‘मिटिगेटिंग फैक्टर्स’ (राहतकारी कारक) मानते हुए आजीवन कारावास के बजाय न्यूनतम सजा सुनाई। केस में कब क्या हुआ 08.07.2014: परिवादी अनिल कुमार सोनी ने सीबीआई को लिखित शिकायत दी। 10.07.2014: सीबीआई जोधपुर ने एफआईआर दर्ज की। 28.07.2014: रेलवे ने अभियुक्त को चीफ बुकिंग सुपरवाइजर के पद से हटाया। 15.12.2014: सीबीआई ने अदालत में आरोप पत्र (चार्जशीट) पेश की। 06.08.2015: अभियुक्त के खिलाफ कोर्ट में आरोप तय (चार्ज फ्रेम) किए गए। 08.05.2026: करीब 11 वर्ष के ट्रायल के बाद सीबीआई कोर्ट ने सजा सुनाई।
