13 ग्रेनेडियर्स-गंगा जैसलमेर रिसाला बटालियन ने शनिवार को जयपुर मिलिट्री स्टेशन पर अपना स्थापना दिवस मनाया। इस मौके पर बटालियन द्वारा कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। राठौड़ का इस बटालियन से पारिवारिक जुड़ाव भी रहा है। उनकी तीन पीढ़ियों ने इस गौरवशाली रीसाले में सेवाएं दी हैं। उनके पूर्वज इस बटालियन में प्रथम, द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों तक में शामिल हुए हैं। इस मौके पर कर्नल राठौड़ ने बटालियन के शौर्य, परंपरा और बलिदान को नमन करते हुए कहा कि ऐसी सैन्य विरासत केवल इतिहास नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। करीब 561 वर्ष पुरानी सैन्य इकाई
दरअसल, यह भारतीय सेना की एक गौरवशाली और ऐतिहासिक पैदल सेना बटालियन है, जिसे मूल रूप से बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह द्वारा 1889 में ‘गंगा रिसाला’ (ऊंट सेना) के रूप में गठित किया गया था। स्वतंत्रता के बाद 1951 में इसे जैसलमेर के ऊंट सैनिकों के साथ मिला दिया गया, जिससे ‘गंगा जैसलमेर रिसाला’ बना और यह भारतीय सेना की द ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट की 13वीं बटालियन (13 ग्रेनेडियर्स) के रूप में शामिल हुई। ऐतिहासिक रूप से 3 अक्टूबर 1465 को ही बीकानेर रियासत के संस्थापक राव बीका ने मारवाड़ से कूच किया था, जिसे बटालियन अपनी सैन्य परंपरा और विरासत की शुरुआत मानती है। हालांकि, आधुनिक ‘गंगा रिसाला’ (ऊंट सेना) का औपचारिक गठन महाराजा गंगा सिंह द्वारा 1889 में किया गया था। युद्ध में पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा किया
यह सैन्य इकाई भारतीय सेना की सबसे पुरानी और अनुभवी सैन्य टुकड़ियों में से एक है। इसके सैनिकों में बड़ी संख्या राजस्थान के सीकर, झुंझुनू और नागौर जिलों से आती है। इसने साल 1965 के भारत-पाक युद्ध में इस बटालियन ने तनोट माता मंदिर की रक्षा करते हुए सांचू और साधेवाला की महत्वपूर्ण चौकियां कब्जे में ली। वही 1971 के युद्ध में बटालियन ने पाकिस्तान के करीब 300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर रणहाल और बिजनोट जैसे महत्वपूर्ण स्थान अपने नियंत्रण में लिए।