जयपुर के ईदगाह की सुल्ताना बेगम नवजात बच्चे को अपना दूध नहीं पिला पाईं। क्योंकि पर्याप्त दूध नहीं आ रहा था। ऐसे में फॉर्मूला मिल्क पिलाना पड़ा। छह महीने मां का दूध नहीं मिलने से बच्चा कमजोर होने लगा। सांगानेरी गेट के महिला चिकित्सालय में भर्ती करौली की छोटी और उसी वार्ड में भर्ती बादामी की भी यही पीड़ा है। ये सिर्फ 3 महिलाओं की कहानी नहीं है। हाल ही में जारी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 की रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में शिशु स्तनपान की दर में गिरावट आई है। शुरुआती 6 महीने तक स्तनपान की दर साल 2019-21 में 64% थी जो 2023-24 में घटकर 56% रह गई। राजस्थान में तो स्तनपान की दर 13% तक घटी है। राज्य में 2019-21 में ये दर 70% थी जो घटकर 54% हो गई है। इसका मतलब 100 में 46 बच्चों को मां का दूध नहीं मिलता। कई केस वो, जिनमें पहली बार मां बनी महिला जयपुर के जनाना अस्पताल के पीडियाट्रिक विभाग में डॉ. अभिषेक गुप्ता के पास आने वाले 10 में से 7 केस में मां बच्चे के लिए पर्याप्त मिल्क प्रोड्यूस नहीं कर पा रहीं। परिजन डॉक्टर से फॉर्मूला मिल्क और पैकेट वाले पाश्चरीयकृत दूध के लिए परमिशन ले रहे थे। इन केस में कई वो हैं जो पहली बार मां बनीं हैं। पहली बार मां बनने वाली महिलाओं को बच्चों को सही तरीके से दूध पिलाने में वक्त लगता है। कई बार कारण वे समझ ही नहीं पातीं कि बच्चे को कैसे दूध पिलाया जाए। वहीं कई माएं खुद हेल्दी नहीं होने के कारण भी दूध ही प्रॉड्यूस नहीं कर पा रही हैं। डिलीवरी के बाद महिलाओं को शिशु को दूध पिलाने की कांउसलिंग भी जरुरी होती हैं, लेकिन नहीं मिल पाती। इसमें परिवार का सपोर्ट भी अहम होता है। इसे पूजा के केस से समझ सकते हैं। 35 साल की पूजा डेढ़ साल पहले मां बनी थी। पूजा का कहना है कि उसे बच्चे को दूध पिलाने में कभी दिक्कत नहीं आई। डिलीवरी के बाद परिवार का सहयोग रहा। ऐसे में पूजा ने अपना अधिकतर समय सिर्फ बच्चे की देखभाल और खुद के स्वास्थ्य पर दिया। ब्रेस्टफीडिंग से पोस्टपार्टम डिप्रेशन कम होता है डॉ. अभिषेक गुप्ता के अनुसार शुरुआत के 6 महीने केवल मां का दूध बहुत जरूरी होता है। वे बताते हैं कि ये प्रक्रिया सिर्फ बच्चे ही नहीं मां के लिए भी उतनी ही जरूरी है। स्तनपान कराने से ऑक्सीटोसीन होर्मोन बढ़ता है। मां और बच्चे के बीच भावनात्मक लगाव जुड़ता है। वहीं रेगुलर स्तनपान से डिलीवरी के बाद होने वाला पोस्टपार्टम डिप्रेशन कम होता है। अवेयरनेस की कमी और सिजेरियन डिलीवरी भी एक कारण मां का स्ट्रेस बच्चे के लिए खतरा डॉ. गुप्ता के अनुसार शुरुआती 6 महीनों तक केवल मां का दूध बच्चे के लिए बहुत जरुरी है। इसके लिए मां का खानपान पोषण से भरपूर होना चाहिए, ताकि वे प्रॉपर स्तनपान करवा सकें। वहीं डिलीवरी के बाद मां को स्ट्रेस बिल्कुल नहीं लेने देना चाहिए। मानसिक तनाव से अक्सर दूध बंद हो जाता हैं। इस दौरान मानसिक सपोर्ट और मां के आस पास के माहौल का खुशनुमा होना जरूरी है। समय पर मां का दूध नहीं मिलने पर बच्चे को यूरिन प्रॉब्लम और पीलिया जैसी बीमारी हो जाती है। पारंपरिक घुट्टी की वजह से दूध नहीं पिला रही माएं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. वर्तिका सोनी कहती हैं कि नॉर्मल हो या फिर सिजेरियन डिलीवरी, महिलाओं की ब्रेस्टफीडिंग को लेकर काउंसलिंग करना जरूरी है। उनके अनुसार कई बार डिलीवरी के बाद माएं नॉर्मल नहीं हो पातीं या फिर ऑपरेशन के बाद दर्द के कारण बच्चे को फीड नहीं करवा पााती है। कई लोग आज भी पारंपरिक तौर पर दी जाने वाली गुड़ और शहद की घुट्टी शिशुओं को देने में विश्वास करते हैं। मां जब दूध नहीं पिला पाती है बच्चे को इस तरह की घुट्टी बनाकर देते हैं ताकि भूख न लगे। डॉक्टर्स का कहना है कि इस तरह की घुट्टी से कई बार बच्चे को इन्फेक्शन और जानलेवा बीमारी भी हो जाती है।
