नाथद्वारा में पुष्टिमार्गीय प्रधान पीठ श्रीनाथजी मंदिर में आज(रविवार) को ज्येष्ठाभिषेक स्नान उत्सव परंपरागत विधि-विधान और श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस मौके पर प्रभु का विशेष श्रृंगार किया गया और उन्हें सवा लाख से अधिक आमों का भोग अर्पित किया गया। मान्यता के अनुसार- बृजवासियों की ओर से ऋतुफल के रूप में प्रभु को आम भेंट किए गए थे, इसी परंपरा के तहत ज्येष्ठाभिषेक के अवसर पर आमों का विशेष भोग लगाया जाता है। बाद में प्रसाद स्वरूप आमों का वितरण श्रद्धालुओं में किया गया। स्वर्ण जड़ित शंख से कराया ज्येष्ठाभिषेक स्नान
मंदिर प्रशासन ने बताया कि ज्येष्ठा नक्षत्र के मौके पर तिलकायत महाराज की आज्ञा से युवाचार्य गोस्वामी विशाल बावा और लाल बावा ने श्रीनाथजी प्रभु व लाडले लाल को सुगंधित अधिवासित यमुना जल से स्वर्ण जड़ित शंख से ज्येष्ठाभिषेक स्नान कराया। मंगला दर्शन के बाद श्रीजी प्रभु को धोती-उपरणा धारण करवाकर अभिषेक की सेवा की गई। इस दौरान प्रभु के स्नान के अलौकिक दर्शन करीब ढाई घंटे तक चले, जिसमें राजस्थान के अलावा, गुजरात, मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और प्रभु के दर्शन किए। अभिषेक के बाद विशेष श्रृंगार किया गया और प्रभु को सवा लाख से अधिक आमों का भोग अर्पित किया गया। फिर इसे प्रसाद स्वरूप श्रद्धालुओं में बांट दिया गया। मंदिर की बावड़ी के जल से होता है पूजन
युवाचार्य गोस्वामी विशाल बावा ने बताया- यह जन्माष्टमी की तरह नक्षत्र प्रधान उत्सव है। ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष में ज्येष्ठा नक्षत्र होने पर सूर्योदय से पूर्व प्रभु को शीतल अष्टगंध से अधिवासित जल से पुरुष सूक्त के मंत्रोच्चार के बीच स्नान कराया जाता है। उन्होंने बताया कि अभिषेक के लिए एक दिन पहले मंदिर की भीतर की बावड़ी से जल लाकर विधिवत पूजन किया जाता है। इस जल में कदंब, कमल, गुलाब, जूही सहित आठ प्रकार के पुष्प, केसर, चंदन और यमुना जल मिलाकर अधिवास किया जाता है। यह सेवा बाल स्वरूप प्रभु के सुखारोग्य और रक्षा भाव से की जाती है। प्रभु को बालक मानकर होती है पूजा भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप हैं यहां। भगवान को 7 साल का बालक मानकर सेवा पूजा होती है। मंदिर में काली पाषाण प्रतिमा है। दुनियाभर में यह एक ही मंदिर है जहां भगवान को 21 तोपों की सलामी दी जाती है। नाथद्वारा के स्वामी भगवान श्रीनाथजी हैं। ऐसा बताते हैं कि भगवान की प्रतिमा में हीरे जड़े हैं। मान्यता है कि यहां चावल के दानों में भी श्रीनाथजी के दर्शन होते हैं। यहां से लोग चावल के दाने ले जाते हैं और तिजोरी में रखते हैं। इससे घर में समृद्धि आती है। माना जाता है कि श्रीनाथजी भगवान का वह बालरूप हैं, जब गोकुल को इंद्र के कोप बचाने के लिए भगवान ने गोवर्धन पर्वत उठा लिया था। तब एक शिला पर उनकी काली छाया छप गई। भगवान ने इंद्र की पूजा करने के बजाय गौ सेवा की प्रेरणा गोकुल वासियों को दी थी, इससे इंद्र नाराज हो गए और जोरदार बारिश की। भगवान ने इंद्र का घमंड तोड़ दिया। श्रीनाथजी के मंदिर में 8 झांकियां होती हैं। मान्यता के अनुसार बाल कृष्ण इतने आकर्षक थे कि उन्हें देखने गोपियां नंद बाबा के घर बार-बार चक्कर लगाती थीं। यशोदा माता को इस बात की परेशानी रहने लगी कि गोपाल के खान-पान और आराम में बाधा पैदा होगी। इसलिए उन्होंने बाल गोपाल से मिलने का समय तय कर दिया।
