नमस्कार इधर प्रदेशभर में ‘ईंधन बचाओ अभियान’ चल रहा है और उधर बाड़मेर में विधायकजी ने ईंधन (पेट्रोल) से स्नान कर लिया। राजधानी में विपक्षी युवा संगठन वालों ने चलते मैच में ‘बंटा’ का बैनर दिखा दिया। मारवाड़ में मास्टरजी ‘फूंकारा’ खा रहे हैं और कान्स में जयपुर की मॉडल ने दिखाया अनोखा अंदाज। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. भाटीजी ने ईंधन से किया स्नान प्रदेशभर में ‘ईंधन बचाओ अभियान’ जोर-शोर से चल रहा है। सरकार ने काफिला घटा दिया। मंत्रीगण रील के जरिए रेल-रिक्शा तक में दिख चुके। बड़े-बड़े अधिकारी भी कड़ी धूप में साइकिल के पैडल मार रहे। तेल बचाने की मुहिम में हर कोई शामिल है। इधर राजधानी में सप्लाई घटने के बाद एक पेट्रोल पंप पर क्रिकेट खेलने का अभिनव प्रयोग भी कर लिया गया। कुल मिलाकर चारों दिशाओं से ‘बचाओ-बचाओ’ की ध्वनि सुनाई दे रही है। इसके बावजूद बाड़मेर के शिव से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने खुद पर ईंधन उड़ेल लिया। भाटीजी बैग में छिपाकर पेट्रोल की बोतल लाए थे। ढक्कन खोलकर बोतल ऊपर डाल ली। कॉन्स्टेबल दमाराम ने झपट्टा मारकर बोतल छीनी और कुछ बूंद ईंधन बचा लिया। वैसे भाटीजी को ईंधन से ज्यादा गिरल की लिग्नाइट माइंस के मजदूरों की फिक्र है। उन्हीं के लिए कई दिन धरने पर रहे। मजदूर बचेगा तो ईंधन भी बच ही जाएगा। 2. स्टेडियम में ‘बंटा’ राजधानी के स्टेडियम में छक्कों-चौंकों की बरसात हो रही थी। नन्हा क्रिकेटर जलवे बिखेर रहा था। अचानक 6 लड़के खड़े हुए और अंग्रेजी में ‘बंटा’ का बैनर बनाकर कतार से खड़े हो गए। न तो बंटा कोई टीम, न ही बंटा कोई खिलाड़ी। फिर बंटा क्या है? आस-पास चर्चा शुरू हो गई। लड़कों के गले में खास पटका था जो NSUI के कार्यकर्ताओं के गले में दिखता है। वे सचमुच कार्यकर्ता ही थे। उन्होंने नारेबाजी शुरू कर दी- नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को बैन करो। तब समझ आया कि यह बंटा नहीं बल्कि बैन-NTA है। खेल के बीच खेल हो गया। वैसे खेल तो यत्र-तत्र-सर्वत्र चल रहा है। मैच से पहले स्टेडियम के बाहर एंट्री पास भी लीक हो रहे थे। पास बेचते कई लड़के कैमरे में कैद हुए। 3. मास्टरजी का ‘फूंकारा’ सूर्यदेव का तेज सूर्यवंशी की परफॉर्मेंस की तरह कहर ढाए हुए हैं। आसमान से आग बरस रही है। स्कूलों की छुटि्टयां चल रही हैं। दुपहरी घर में दुबकने में ही भलाई। लेकिन मास्टरजी के कंधों पर भारी जिम्मेदारी। जनगणना का काम पूरा करना है। मकानों की लिस्टिंग की जा रही है। ऐसे में मास्टरजी भरी दोपहर गांव-गांव भटक रहे हैं। मारवाड़ में मास्टर हंसराज और मास्टर रमेशजी भी लिस्टिंग करने निकले। गर्मी में चिड़ी का बच्चा भी मुश्किल से दिखता है। खेत के सूखे पड़े धोरों से होते हुए वे बस्ती तलाश रहे थे। ऐसे हालात में मास्टरजी के दो ही सहारे- पहला मोबाइल और दूसरा किस्से। चलते-चलते दोनों महोदय किस्से सुनाने लगे। किस्सा सुनाते हुए वे बोले- मारवाड़ी भाषा का भी अपना मजा है। हम जनगणना में लिस्टिंग का काम कर रहे थे। भयंकर धूप। एक मकान के मुखिया ने हाथ का इशारा किया और कहा कि मास्टरजी थोड़ा फूंकारा खा लो। मास्टर रमेश झुंझुंनूं से हैं। उन्हें लगा कि खाने के किसी पदार्थ का निमंत्रण मिल गया है। दोनों मुखिया के पास चारपाई पर बैठ गए। दोनों को ठंडा पानी पिलाया गया। मास्टरजी फूंकारा का इंतजार कर रहे थे। इस बीच मुखियाजी बोले- अच्छा हुआ आपने फूंकारा खा खिला। मास्टरजी का सिर घूमा-फूंकारा खा लिया? हमने कब खा लिया? साथी मास्टर हंसराज ने समझाया- यह जो कड़ी धूप से छांव में आकर ठंडा पानी पिया है, इसी को मारवाड़ में फूंकारा खाना कहते हैं। 4. चलते-चलते.. घूंघट हमारी संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं था। इतिहासकार कहते हैं कि मध्यकाल में बाहरी आक्रमणकारियों ने युद्ध में महिलाओं को टारगेट करना शुरू किया। सार ये कि जब नारी पर नीयत खराब हुई, जब नजर में खोट पैदा हुई तो घूंघट बचाव का हथियार बन गया। दक्षिण भारत तक बाहरी आक्रमणाकरियों का प्रभाव नहीं रहा इसलिए वहां घूंघट प्रथा भी देखने को नहीं मिलती। धीरे-धीरे कुछ राज्यों में घूंघट एक रिवाज बन गया, जिसे बड़ों के सम्मान के तौर पर देखा जाने लगा। लेकिन घूंघट की इतनी चर्चा क्यों? वो इसलिए क्योंकि जयपुर की एक मॉडल रुचि गुर्जर ने कान्स फिल्म फेस्टिवल में घूंघट का विरोध किया। विरोध करने के लिए वे घूंघट में ही रेड कारपेट पर पहुंचीं। अपने इंस्टाग्राम के जरिए ‘घूंघट’ से आजादी का नारा दिया। मैसेज में गहराई है। क्योंकि महिलाएं-लड़कियां-बच्चियां अब भी सुरक्षित नहीं। परदे की जरूरत जरूर है, लेकिन महिलाओं को नहीं। नीयत और नजर को। इनपुट सहयोग- अनुराग त्रिवेदी (जयपुर), ऋषभ सैनी (जयपुर), विजय कुमार (बाड़मेर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।
