उदयपुर के पूर्व राजपरिवार की सदस्य पद्मजा कुमारी ने कहा- टाइप-1 डायबिटीज को लेकर फैली डरावनी भ्रांतियों को हमें बंद करना होगा। जब मैं पांच साल की थी, तब मुझे यह बीमारी हुई थी, लेकिन इसके बारे में जो कुछ भी सुना था, वह सही नहीं था। पद्मजा कुमारी ने कहा- हम देशभर में इस बीमारी के साथ जी रहे लोगों की कहानियां दुनिया को बताना चाहते हैं, ताकि उन तक यह संदेश जाए कि टाइप-1 डायबिटीज होने के बाद भी हम अपनी जिंदगी बेहद शानदार और बेहतर तरीके से जी सकते हैं। पद्मजा कुमारी ने गुरुवार को जोधपुर में शुरू हुई ‘टाइप-1 डायबिटीज समिट’ के दौरान कही।
मेरी आवाज इस कमरे तक ही सीमित न रहे
पद्मजा कुमारी ने कहा- मैं हमेशा लोगों को धन्यवाद देना चाहूंगी, क्योंकि मुझे लगता है कि अगर मैं ऐसा नहीं करूंगी, तो मेरी आवाज सिर्फ उसी कमरे तक सीमित रह जाएगी जहां मैं हूं।” इस समिट को लेकर उन्होंने कहा- मैं पिछले पांच वर्षों से इस समिट का आयोजन कर रही हूं, लेकिन जोधपुर में पहली बार मैंने इस समिट का आयोजन किया है। उन्होंने आगे कहा- इस समिट का मुख्य उद्देश्य इस बीमारी से ग्रसित एक बड़े वर्ग (ग्रुप) की पहचान करना, उनकी स्थिति (कंडीशन) और डर को समझना तथा इसके पीछे के विज्ञान (साइंस) पर खुलकर बात कर उन्हें जागरूक करना है। इस कार्य में हमें सरकार का भी काफी सहयोग मिल रहा है। हमें डरावनी भ्रांतियों को खत्म करना होगा; यह खाने-पीने की आदतों से नहीं होता पद्मजा कुमारी ने इस बीमारी को लेकर स्पष्ट किया कि यह कुछ खाने या पीने से नहीं होता। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि चॉकलेट खाने या ज्यादा मीठा खाने से किसी को टाइप-1 डायबिटीज हो जाए। यह एक ऑटोइम्यून डिजीज (Autoimmune Disease) है। टाइप-1 डायबिटीज में शरीर का पैनक्रियाज (Pancreas) इंसुलिन नहीं बना पाता है, जिसकी वजह से यह बीमारी होती है, न कि गलत खान-पान से। उन्होंने आगे कहा- अगर मुझे भी यह बीमारी हुई है, तो किसी खाने या चॉकलेट की वजह से नहीं हुई है। हमें इस बीमारी को लेकर समाज में फैली डरावनी भ्रांतियों और अफवाहों को बंद करना होगा और लोगों को यह बताना होगा कि टाइप-1 डायबिटीज के साथ भी हम बेहद आसानी और खुशी से अपनी जिंदगी जी सकते हैं।
जब मैं पांच साल की थी, तब मुझे यह बीमारी हुई थी बातचीत में पद्मजा कुमारी ने बताया- टाइप-1 डायबिटीज (T1D) को लेकर समाज में कई ऐसी गलत जानकारियां फैली हुई हैं, जो बिल्कुल सही नहीं हैं। जब मैं पांच साल की थी, तब मुझे यह बीमारी हुई थी। उस समय मैंने इसके बारे में जो कुछ भी सुना था, वह सच नहीं था। हम चाहते हैं कि अब जिन्हें यह बीमारी हो रही है, उन तक कोई गलत जानकारी न पहुंचे। मेरे साथ मौजूद नूपुर और स्नेहल को भी टाइप-1 डायबिटीज है।” स्कूलों और गांवों में जाकर लोगों को कर रहे जागरूक बातचीत के दौरान अपना अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा- हम इस बीमारी के चार मुख्य लक्षणों के बारे में बात करते हैं। यदि किसी में ये लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत इसकी जांच करानी चाहिए। पहले माना जाता था कि यह बीमारी एक निश्चित आयु वर्ग (एज ग्रुप) के लोगों को ही होती है, लेकिन अब यह किसी को भी हो सकती है। इसे लेकर हम लोग स्कूलों और गांवों में जाकर जागरूकता अभियान चला रहे हैं। लोगों को टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज के बीच का अंतर समझाना बेहद जरूरी है, क्योंकि टाइप-1 को इंसुलिन के माध्यम से ही ट्रीट (उपचार) और मैनेज किया जा सकता है। जब बच्चों के मामले सामने आते हैं, तो हम बिल्कुल बेसिक चीजों पर बात करते हैं ताकि उनके मन से डर निकल सके। इसके साथ ही हम इंसुलिन, शुगर मॉनिटरिंग, डाइट और एक्सरसाइज को लेकर भी उन्हें लगातार गाइड करते हैं।
