जब कोई भर्ती 4 साल तक लटकी रहती है, तो वह सिर्फ एक सरकारी फाइल नहीं अटकती, बल्कि उस फाइल के साथ आदित्य, राघवेंद्र और ऋषभ जैसे हजारों होनहार युवाओं की जिंदगी और उनके परिवारों की उम्मीदें भी अधर में लटक जाती हैं. महीने का 8 हजार रुपये खर्च उठाना इन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए कितना भारी पड़ता है, इसका अहसास शायद वातानुकूलित दफ्तरों में बैठे अफसरों को नहीं है. आइए जानते हैं अभ्यर्थ‍ियों का पक्ष.