मानवता का सबसे निस्वार्थ रूप शायद यही है, मरने के बाद भी किसी की जिंदगी में रोशनी छोड़ जाना। जयपुर में देहदान को लेकर जागरूकता लगातार बढ़ रही है। एसएमएस मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग में पिछले 37 साल में 344 लोग देह वैज्ञानिक अध्ययन और रिसर्च के लिए दान कर चुके हैं। इस साल 30 देहदान हो चुके हैं, जबकि पिछले साल 37 थे। पहला देहदान 1988 में हुआ था। 2005 के बाद से ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है। अब तो कॉलेज आवेदन और अंडरटेकिंग पर देहदान स्वीकार करता है और आवश्यकता पड़ने पर एम्बुलेंस भी भेजी जाती है। कहां-कहां सुविधा उपलब्ध जयपुर और आसपास के ये संस्थान देहदान स्वीकार करते हैं। इनमें एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (मानद विश्वविद्यालय), महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज, स्वास्थ्य कल्याण होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज, गीतांजलि इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, डॉ. एम.पी.के. होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर, सांगानेर, निम्स यूनिवर्सिटी, जेएनयू मेडिकल कॉलेज। इन स्थानों पर परिजन सीधे एनाटॉमी विभाग को मृत देह सौंपते हैं। जैन सोशल ग्रुप सेंट्रल संस्था भी परिजनों की सहमति के बाद मृत देह कॉलेज तक उपलब्ध करवाती है। संकल्प…: मेरी देह मेडिकल छात्रों के काम आए आदर्श नगर निवासी 85 वर्षीय लक्ष्मी सेवानी का हाल ही में निधन हुआ। गुरुवार को उनके परिजनों ने उनका शरीर एसएमएस मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग को सौंप दिया। परिजनों के अनुसार, ‘लक्ष्मीजी ने जीवन में ही यह संकल्प लिया था कि उनकी देह मेडिकल छात्रों की पढ़ाई और रिसर्च के काम आए।’ किसी इंसान का आ​खिरी निर्णय इतना बड़ा योगदान बन जाए- इससे बड़ा जीवन का सम्मान शायद ही कुछ हो। देहदान क्यों जरूरी है? नेशनल मेडिकल कमिशन (एनएमसी), नई दिल्ली के अनुसार मेडिकल विद्यार्थियों की पढ़ाई का पहला दिन ही मृत देह से शुरू होता है। यही उन्हें सिखाता है -शरीर संरचना की गहराई, घायल या बीमार मरीज के शरीर को समझना, ऑपरेशन के लिए आवश्यक आत्मविश्वास और दक्षता, मृत देह डॉक्टर को वह समझ देती है, जो कोई किताब नहीं दे सकती।