पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने पूर्व जज आलोक सिंह की कड़ी आलोचना करते हुए एक जिला जज को गलत तरीके से जबरन रिटायर करने के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ पांच महीने की नकारात्मक रिपोर्ट के आधार पर यह कार्रवाई “गलत, गैरकानूनी और दुर्भावनापूर्ण” थी। दरअसल, सिरसा जिले के प्रशासनिक जज रहे आलोक सिंह ने 2010-11 के आखिरी 5 महीनों में जिला जज डॉ. शिवा शर्मा की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में नकारात्मक टिप्पणियां लिख दी थीं। इसमें कहा गया कि उनकी “ईमानदारी संदिग्ध” है। इन टिप्पणियों के आधार पर शिवा शर्मा को 58 साल की उम्र में जबरन रिटायर कर दिया गया था। कोर्ट ने पाया कि आलोक सिंह द्वारा लिखी गई नकारात्मक टिप्पणियां बिना किसी ठोस सबूत या जांच के थीं। हाईकोर्ट ने जबरन रिटायरमेंट के आदेश को रद्द करते हुए डॉ. शर्मा को सभी लाभ देने का आदेश दिया है, हालांकि उन्हें सेवा से बाहर रहने की अवधि का वेतन नहीं मिलेगा। 30 साल तक अच्छी रिपोर्ट कोर्ट की डिवीजन बेंच (मुख्य न्यायाधीश शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी) ने कहा कि डॉ. शिवा शर्मा को 30 साल की सेवा में हमेशा “गुड” और “वेरी गुड” की रेटिंग मिली। ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि जो अधिकारी 3 दशक तक अच्छा काम करता रहा, वह अचानक भ्रष्ट या संदिग्ध कैसे हो सकता है। हाईकोर्ट ने पाया कि जज आलोक सिंह द्वारा लिखी गई नकारात्मक टिप्पणियां किसी लिखित शिकायत, पुख्ता सबूत या जांच पर आधारित नहीं थीं। बल्कि ये बिना ठोस आधार के दी गई थीं। कोर्ट ने कहा कि कम से कम प्रशासनिक जज को गुप्त सतर्कता जांच करनी चाहिए थी और फिर डॉ. शर्मा से जवाब मांगना चाहिए था। अगर जांच में कुछ गड़बड़ी मिलती तो बाकायदा विभागीय जांच चलती। लेकिन इनमें से कोई भी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। नियमों के खिलाफ जबरन रिटायरमेंट बेंच ने कहा कि “पब्लिक इंटरेस्ट” में दी जाने वाली जबरन रिटायरमेंट सजा नहीं मानी जाती, लेकिन इसे तभी दिया जा सकता है, जब अधिकारी के पूरे सर्विस रिकॉर्ड और खासकर आखिरी वर्षों के कामकाज को ध्यान से परखा जाए। यहां ऐसा नहीं किया गया, बल्कि सिर्फ 5 महीने की नकारात्मक रिपोर्ट के आधार पर डॉ. शर्मा को रिटायर कर दिया गया। कोर्ट ने इसे “गलत, गैरकानूनी और दुर्भावनापूर्ण” करार दिया। हाईकोर्ट ने रद्द किया आदेश, सभी लाभ मिलेंगे कोर्ट ने जबरन रिटायरमेंट का आदेश रद्द कर दिया और कहा कि डॉ. शिवा शर्मा को सभी लाभ मिलेंगे। इनमें सीनियारिटी, वेतन निर्धारण, पेंशन की गणना और पेंशन की बकाया राशि शामिल होगी। हालांकि, जिस समय वे सेवा से बाहर रहे, उस दौरान का बकाया वेतन नहीं मिलेगा। ये था मामला यह केस डॉ. शिवा शर्मा बनाम पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के नाम से चला। उनकी ओर से वकील एसके गर्ग नरवाना और अरव गुप्ता ने पक्ष रखा। वहीं हाईकोर्ट की ओर से वकील सुमीत महाजन और उनकी टीम ने पैरवी की। हरियाणा सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता दीपक बल्यान मौजूद रहे।
