2 महीने का नन्हा गोडावण… सामने मिट्टी, झाड़ियां और तेज धूप। खतरा महसूस होते ही झाड़ियों में छिप जाना, मिट्टी कुरेदकर कीड़े ढूंढना और प्यास लगने पर खुद पानी तक पहुंचना, ये सब अब ये चूजे (गोडावण के बच्चे) सीख रहे हैं। खास बात यह है कि उन्हें यह ट्रेनिंग किसी क्लासरूम में नहीं, बल्कि रेगिस्तान के जंगल जैसा माहौल तैयार कर बनाई गई 9.25 करोड़ रुपए की रिवाइल्डिंग टनल में दी जा रही है। जैसलमेर के रामदेवरा स्थित गोडावण ब्रीडिंग सेंटर में बनी रिवाइल्डिंग टनल में तीन चूजों (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) को एक महीने पहले लाया गया था। उस समय उनकी उम्र महज एक महीना थी। अब वे दो महीने के हो चुके हैं और धीरे-धीरे इंसानी देखरेख से दूर रहकर प्राकृतिक माहौल में जीना सीख रहे हैं। पढ़िए यह रिपोर्ट… अब देखिए- गोडावण के चूजों की 2 तस्वीरें चूजे टनल में खुद पूरी कर रहे अपनी जरूरतें ACF वन्यजीव अशोक सिंह ने बताया- टनल में आने के समय तीनों चूजे इंसानी देखरेख और तैयार भोजन पर निर्भर थे। अब वे खुद अपना भोजन तलाश रहे हैं। एक महीने की ट्रेनिंग में उन्होंने प्राकृतिक हवा, तापमान में बदलाव और सीधी धूप का सामना करना भी सीख लिया है। फिलहाल तीनों चूजे स्वस्थ हैं और उनका शारीरिक विकास तेजी से हो रहा है। गोडावण को खुले जंगल में रहने के लिए तैयार करने के उद्देश्य से रिवाइल्डिंग टनल में प्राकृतिक झाड़ियां, घास और छोटे पेड़-पौधे लगाए गए हैं। तेज धूप और गर्मी से बचाव के लिए छायादार हिस्से और प्राकृतिक शेड भी बनाए गए हैं। टनल में दो अलग-अलग स्थानों पर पानी की व्यवस्था है, जहां चूजे अपनी जरूरत के अनुसार खुद जाकर पानी पीते हैं। स्पेशल कपड़े पहनते हैं टीम के सदस्य
ब्रीडिंग सेंटर में जन्मे गोडावण के सामने सबसे बड़ी चुनौती इंसानों के प्रति बढ़ने वाला लगाव है। ऐसे में पक्षी इंसानों को अपना साथी समझने लगे तो जंगल में लौटने के बाद उनके लिए प्राकृतिक परिस्थितियों में जीवित रहना मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से टनल में जाने वाली टीम के सदस्य मिट्टी के रंग के कपड़े पहनते हैं। खाना और अन्य सामग्री छोटी खिड़कियों के जरिए अंदर रखा जाता है, ताकि चूजों को इंसानी चेहरा दिखाई न दे। खतरा महसूस होते ही झाड़ियों में छिपने लगे
रामदेवरा के प्रोजेक्ट एसोसिएट महेश गुर्जर ने बताया कि तीनों चूजों के व्यवहार में अब प्राकृतिक बदलाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। टनल के ऊपर से कोई बड़ा पक्षी उड़ता है या कोई अनजान आवाज सुनाई देती है तो गोडवण झाड़ियों के पीछे छिप जाते हैं। 10 सीसीटीवी कैमरों से 24 घंटे निगरानी
टनल में 10 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। कंट्रोल रूम से इन कैमरों के जरिए चूजों की निगरानी की जाती है। वाइल्ड लाइफ बायोलॉजिस्ट, डॉक्टर और वनकर्मियों सहित 25 सदस्यीय टीम इनकी देखरेख और मॉनिटरिंग में लगी हुई है। 4 से 6 महीने बाद जंगल में छोड़ने की तैयारी
फिलहाल तीनों चूजे दो महीने के हैं। वन विभाग के अनुसार- जब वे 4 से 6 महीने के हो जाएंगे और मरुस्थलीय परिस्थितियों में पूरी तरह ढल जाएंगे, तब उन्हें टनल से बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसके बाद जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क के खुले क्षेत्र में उन्हें छोड़ा जाएगा। जंगल में आजादी के बाद भी GPS से निगरानी
ACF वन्यजीव अशोक सिंह ने बताया कि GPS से गोडावण की जंगल में भी निगरानी की जाएगी। टनल परियोजना का मुख्य उद्देश्य ब्रीडिंग सेंटर में जन्मे गोडावण को प्राकृतिक जीवन के लिए तैयार करना और उन्हें सुरक्षित तरीके से वापस जंगल में बसाना है। रामदेवरा में चल रहा यह प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में ब्रीडिंग सेंटर में जन्मे गोडावण के बच्चों को भी इसी प्रक्रिया के जरिए खुले जंगल में छोड़े जाने का रास्ता साफ हो सकता है।